सागर में कंधों पर बैठाकर मां काली को दी जाती है विदाई, 122 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम; विसर्जन जुलूस में सबसे आगे चलती है मशाल
मध्य प्रदेश के सागर में मां काली की विदाई की एक अनूठी परंपरा आज भी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जाती है। यहां मां काली की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। बताया जाता है कि यह परंपरा करीब 122 साल पुरानी है। वर्षों से चली आ रही इस धार्मिक परंपरा में श्रद्धालु पूरे उत्साह और भक्ति के साथ शामिल होते हैं।
मां काली के विसर्जन जुलूस में मशाल सबसे आगे चलती है। इसके बाद प्रतिमा को कंधों पर उठाकर श्रद्धालु आगे बढ़ते हैं। जुलूस के दौरान भक्त मां काली के जयकारे लगाते हैं और पूरे माहौल में भक्ति का रंग नजर आता है। इस परंपरा में स्थानीय लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है।
122 साल से निभाई जा रही परंपरा
सागर में मां काली की विदाई की यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। करीब 122 साल से चली आ रही इस परंपरा को स्थानीय श्रद्धालु धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मानते हैं। समय के साथ कई बदलाव हुए, लेकिन मां काली को कंधों पर बैठाकर विदाई देने की परंपरा आज भी कायम है।
श्रद्धालुओं के लिए यह केवल विसर्जन जुलूस नहीं, बल्कि मां के प्रति समर्पण और भावनात्मक जुड़ाव का अवसर भी है। भक्त मां काली से सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। विदाई के समय माहौल भक्तिमय हो जाता है।
जुलूस में सबसे आगे चलती है मशाल
इस परंपरा की एक खास पहचान विसर्जन जुलूस में सबसे आगे चलने वाली मशाल है। मशाल के आगे रहने के बाद मां काली की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर ले जाया जाता है। जुलूस में शामिल श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ मां को अंतिम विदाई देते हैं।
मां काली की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर ले जाना इस आयोजन को विशेष पहचान देता है। इस दौरान भक्तों की भागीदारी और पारंपरिक तरीके से होने वाला विसर्जन स्थानीय धार्मिक संस्कृति की झलक पेश करता है।
आस्था और विरासत का प्रतीक
सागर की यह परंपरा बताती है कि धार्मिक आयोजन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे समाज की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़े रहते हैं। 122 साल पुरानी बताई जा रही यह परंपरा आज भी लोगों को अपनी विरासत से जोड़ती है।
मां काली की विदाई के दौरान श्रद्धालु भावुक होकर मां को विदा करते हैं और अगले वर्ष फिर दर्शन देने की कामना करते हैं। कंधों पर प्रतिमा, आगे चलती मशाल और भक्तों के जयकारों के बीच होने वाला यह जुलूस सागर की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में अपनी अलग पहचान रखता है।