फर्जी वसीयत मामले में MP हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, गंभीर जालसाजी पर सिविल कोर्ट FIR का दे सकता है आदेश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने फर्जी वसीयत से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी संपत्ति विवाद में गंभीर जालसाजी या धोखाधड़ी सामने आती है तो सिविल कोर्ट की भूमिका केवल संपत्ति के अधिकार और विवाद के निपटारे तक सीमित नहीं रहती। ऐसी स्थिति में अदालत सीपीसी की धारा 151 के तहत मिली अंतर्निहित शक्ति का इस्तेमाल करते हुए पुलिस को शिकायत भेजकर एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश दे सकती है।
कोर्ट की यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें कथित तौर पर फर्जी वसीयत के जरिए संपत्ति से जुड़े अधिकार हासिल करने का मामला सामने आया था।
गंभीर जालसाजी पर कार्रवाई संभव
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि न्यायिक कार्यवाही के दौरान किसी दस्तावेज में गंभीर फर्जीवाड़ा या जालसाजी सामने आती है तो अदालत केवल पक्षकारों के बीच संपत्ति विवाद का फैसला करके मामले को समाप्त करने तक सीमित नहीं है। न्यायालय अपने सामने आए गंभीर अपराध के संबंध में उचित कदम उठाने के लिए अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है।
कोर्ट ने सीपीसी की धारा 151 का उल्लेख करते हुए कहा कि इस प्रावधान के तहत अदालत के पास न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक आदेश देने की शक्ति होती है।
पुलिस को शिकायत भेजकर FIR का निर्देश
अदालत ने माना कि गंभीर जालसाजी के मामले में सिविल कोर्ट पुलिस को शिकायत भेज सकती है और एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे सकती है। इसका उद्देश्य कथित अपराध की आपराधिक जांच का रास्ता खोलना और दस्तावेजों की सत्यता की जांच कराना है।
इस टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि किसी सिविल मुकदमे के दौरान सामने आने वाली गंभीर धोखाधड़ी या जालसाजी को अदालत केवल निजी संपत्ति विवाद के तौर पर देखने तक सीमित नहीं है।
फर्जी वसीयत के मामलों में अहम टिप्पणी
वसीयत से जुड़े विवादों में दस्तावेज की वास्तविकता और उसके आधार पर संपत्ति पर किए गए दावे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि वसीयत ही फर्जी पाए जाने का आरोप हो और मामले में गंभीर जालसाजी के संकेत सामने आएं, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक जांच भी शुरू हो सकती है।
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे मामलों में सिविल और आपराधिक कार्रवाई के बीच संबंध को स्पष्ट करती है। हालांकि किसी विशेष मामले में एफआईआर और आगे की कार्रवाई का आधार संबंधित तथ्यों, दस्तावेजों और अदालत के आदेश पर निर्भर करेगा।