900 साल पुरानी मूर्ति का बदला इतिहास, भोपाल म्यूजियम में रखी देवी सरस्वती नहीं बल्कि निकलीं मां गायत्री
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के एक म्यूजियम में रखी करीब 900 साल पुरानी एक दुर्लभ प्रतिमा को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। जिस मूर्ति को अब तक मां सरस्वती के रूप में पहचाना जाता था, वह वास्तव में देवी गायत्री की प्रतिमा निकली है। विशेषज्ञों की जांच और शिल्पकला के अध्ययन के बाद इस ऐतिहासिक मूर्ति की सही पहचान सामने आई है।
यह प्रतिमा धार क्षेत्र से प्राप्त हुई थी और लंबे समय से इसे ज्ञान, संगीत और कला की देवी मां सरस्वती से जोड़कर देखा जा रहा था। लेकिन अब पुरातत्व विशेषज्ञों ने मूर्ति में मौजूद विशेष प्रतीकों और आकृतियों के आधार पर इसकी पहचान देवी गायत्री के रूप में की है।
प्रतिमा की पहचान में कैसे हुआ बदलाव?
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी प्राचीन प्रतिमा की पहचान केवल उसके आकार या सामान्य रूप से नहीं की जाती, बल्कि उसमें मौजूद आभूषण, हाथों में धारण की गई वस्तुएं, मुद्रा और शिल्प शैली का बारीकी से अध्ययन किया जाता है।
इस मूर्ति में ऐसे कई संकेत मिले, जो मां सरस्वती की बजाय देवी गायत्री के स्वरूप से मेल खाते हैं। मूर्ति में देवी के कई मुख और विशिष्ट आयुधों का अंकन किया गया है, जो वैदिक परंपरा में वर्णित गायत्री स्वरूप की ओर इशारा करते हैं।
धार की परमारकालीन कला से जुड़ी है प्रतिमा
बताया जा रहा है कि यह प्रतिमा मध्य प्रदेश के धार क्षेत्र से मिली थी। धार प्राचीन समय में परमार वंश का प्रमुख केंद्र रहा था और यहां कला, साहित्य तथा स्थापत्य का काफी विकास हुआ था।
करीब 11वीं-12वीं शताब्दी की मानी जा रही यह प्रतिमा उस दौर की उत्कृष्ट मूर्तिकला का उदाहरण है। परमार काल में देवी-देवताओं की कई दुर्लभ प्रतिमाओं का निर्माण हुआ था, जिनमें धार्मिक मान्यताओं और शिल्प कौशल का अनोखा मेल दिखाई देता है।
पहले क्यों माना गया था सरस्वती का स्वरूप?
मूर्ति में देवी का शांत स्वरूप, अलंकरण और कला से जुड़े संकेतों के कारण इसे लंबे समय तक मां सरस्वती की प्रतिमा माना गया। सरस्वती को ज्ञान, संगीत और विद्या की देवी माना जाता है, इसलिए ऐसी प्रतिमाओं की पहचान में कई बार समानताएं देखने को मिलती हैं।
हालांकि, गहन अध्ययन के बाद विशेषज्ञों ने पाया कि इस प्रतिमा में मौजूद विशेष लक्षण सरस्वती से अधिक गायत्री देवी के स्वरूप से संबंधित हैं।
संग्रहालयों में लगातार हो रही प्राचीन प्रतिमाओं की नई पहचान
पुरातत्व विशेषज्ञ समय-समय पर संग्रहालयों में रखी प्राचीन मूर्तियों का दोबारा अध्ययन करते रहते हैं। कई बार नई तकनीक और शोध के आधार पर वर्षों पुरानी मान्यताओं में बदलाव सामने आता है।
भोपाल म्यूजियम की यह प्रतिमा भी इसी तरह के शोध का परिणाम है। 900 साल पुरानी इस मूर्ति की नई पहचान ने न केवल इतिहासकारों का ध्यान आकर्षित किया है, बल्कि भारतीय मूर्तिकला और धार्मिक परंपराओं के अध्ययन को भी नई दिशा दी है।
अब यह प्रतिमा देवी गायत्री के दुर्लभ स्वरूप के रूप में जानी जाएगी और भारतीय कला इतिहास में इसका महत्व और बढ़ गया है।