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हाई कोर्ट का अहम फैसला: हैबियस कॉर्पस याचिका पर 14 वर्षीय बालिका की कस्टडी पिता को सौंपने के निर्देश

 

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने 6 जुलाई को दिए अपने आदेश में 14 वर्षीय बालिका की कस्टडी उसके पिता को सौंपने के निर्देश दिए हैं। यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पिता एक पॉक्सो (POCSO) मामले में आरोपी हैं।

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान उपलब्ध दस्तावेजों, पक्षकारों की दलीलों और बालिका के हितों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार किया। इसके बाद न्यायालय ने परिस्थितियों के आधार पर बालिका की अभिरक्षा पिता को सौंपने का आदेश पारित किया।

मामले की सुनवाई हैबियस कॉर्पस याचिका के तहत हुई, जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की अभिरक्षा या हिरासत की वैधता की न्यायिक समीक्षा करना होता है। अदालत ने अपने आदेश में मामले के तथ्यों और उपलब्ध कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए निर्णय सुनाया।

चूंकि पिता पॉक्सो मामले में आरोपी हैं, इसलिए यह आदेश कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि, अदालत का फैसला मामले के विशिष्ट तथ्यों और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर दिया गया है। किसी भी आपराधिक मामले में आरोप लगना और दोष सिद्ध होना अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं, तथा अंतिम निर्णय संबंधित मामले के न्यायिक निष्कर्ष पर निर्भर करता है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि बाल संरक्षण से जुड़े मामलों में अदालतें प्रत्येक मामले के तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेती हैं। इसलिए प्रत्येक मामले का फैसला उसकी परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकता है।

हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद मामले को लेकर कानूनी और सामाजिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। फिलहाल संबंधित पक्षों के पास आदेश के विरुद्ध उपलब्ध कानूनी विकल्पों का उपयोग करने का अधिकार भी सुरक्षित है, यदि वे ऐसा उचित समझें।

यह फैसला बाल अभिरक्षा और संवेदनशील मामलों में न्यायालयों की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।