धनतेरस से दीपावली तक महालक्ष्मी मंदिरों में विशेष शृंगार, स्वर्ण आभूषणों से सजेगा मां का दरबार
दीपावली का पर्व मां लक्ष्मी की पूजा और आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। इस अवसर पर शहर के महालक्ष्मी मंदिरों में भी तैयारियां शुरू हो गई हैं। शहर में मां लक्ष्मी के चार प्रमुख मंदिर हैं, जहां धनतेरस की पूर्व बेला से ही माता के विशेष शृंगार की शुरुआत हो जाती है। यह शृंगार दीपावली तक जारी रहता है। इन तीन दिनों में मंदिरों में मां लक्ष्मी की अलौकिक छवि भक्तों के आकर्षण का केंद्र रहती है।
धनतेरस से लेकर दीपावली तक मंदिरों में प्रतिदिन मां लक्ष्मी को सुंदर और आकर्षक वस्त्र धारण कराए जाते हैं। इसके साथ ही स्वर्ण आभूषणों से उनका विशेष शृंगार किया जाता है। हर दिन माता का स्वरूप अलग और मनमोहक दिखाई देता है। मंदिरों में होने वाली इन विशेष तैयारियों को लेकर श्रद्धालुओं में भी उत्साह रहता है।
देश-विदेश से भक्त भेजते हैं शृंगार सामग्री
मां लक्ष्मी के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश ही नहीं, विदेशों में रहने वाले भक्त भी मंदिरों के लिए शृंगार सामग्री भेजते हैं। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार माता के वस्त्र, आभूषण और अन्य सजावटी सामग्री अर्पित करते हैं। इन सामग्रियों से मां का विशेष शृंगार किया जाता है।
मंदिरों में होने वाली सजावट और शृंगार में श्रद्धालुओं की भागीदारी इस पर्व को और खास बना देती है। दूर-दराज में रहने वाले भक्त भी इस माध्यम से मां लक्ष्मी की सेवा और पूजा में अपना योगदान देते हैं।
तीन दिनों तक दिखेगी मां की मनमोहक छवि
धनतेरस, छोटी दीपावली और दीपावली के अवसर पर मां लक्ष्मी के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। इन दिनों मंदिरों में माता का भव्य शृंगार किया जाता है। सुंदर वस्त्रों और स्वर्ण आभूषणों से सजी मां लक्ष्मी की छवि भक्तों को आकर्षित करती है।
दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा को सुख-समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि इस अवसर पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की रुचि बढ़ जाती है। तीन दिनों तक मां के अलग-अलग शृंगार भक्तों के लिए आस्था और आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं।
शहर के चारों प्रमुख महालक्ष्मी मंदिरों में होने वाला यह विशेष आयोजन दीपावली की धार्मिक परंपराओं को जीवंत करता है। हालांकि, मंदिरों के नाम और उनके विशेष कार्यक्रमों का विवरण उपलब्ध नहीं है, इसलिए फिलहाल शृंगार की परंपरा और भक्तों की भागीदारी ही इस आयोजन की प्रमुख विशेषताएं हैं।