शहर में कानून व्यवस्था के दावे फेल? कागजों में सुधार, जमीनी हकीकत पर सवाल
शहर में कानून व्यवस्था को लेकर प्रशासन द्वारा किए जा रहे दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप हैं कि सुधार केवल कागजों और फाइलों तक ही सीमित है, जबकि जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई खास बदलाव नजर नहीं आ रहा है।
सूत्रों के अनुसार, पुलिस की “डेली रिपोर्ट” का रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के बजाय उसे छुपाने की कोशिश की जा रही है। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि वास्तविक अपराध स्थिति और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है।
जानकारों का कहना है कि जमीनी स्तर पर पुलिसिंग को मजबूत करने की बजाय आंकड़ों की बाजीगरी के जरिए थानों और जिले की छवि को बेहतर दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। अपराध नियंत्रण के वास्तविक प्रयासों की जगह रिपोर्टिंग में सुधार दिखाकर व्यवस्था को “ऑल इज वेल” दिखाया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का भी कहना है कि उनके क्षेत्र में अपराध की घटनाओं में कमी के दावे केवल कागजों पर दिखते हैं, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। कई मामलों में शिकायतों पर कार्रवाई में देरी और पुलिस की निष्क्रियता की भी शिकायतें सामने आ रही हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर दिए गए निर्देशों के बावजूद, कई स्तरों पर इन्हें पूरी तरह लागू नहीं किया जा रहा है। इससे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इन आरोपों पर क्या रुख अपनाता है और क्या वास्तव में कानून व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जमीनी सुधार किए जाते हैं या फिर यह मामला भी केवल फाइलों तक ही सीमित रह जाता है।