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पांढुर्णा में सदियों पुरानी गोटमार परंपरा शुरू, जाम नदी में आमने-सामने आए पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष

 

मध्य प्रदेश के पांढुर्णा में सदियों पुरानी गोटमार परंपरा शुक्रवार सुबह एक बार फिर शुरू हो गई। जाम नदी के तट पर सुबह करीब 11 बजे से पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष के लोग आमने-सामने आ गए। परंपरा के तहत नदी के बीच पलाश का झंडा लगाया गया। इसके बाद पूजा-अर्चना की गई और झंडे पर कब्जे को लेकर दोनों पक्षों के बीच पत्थरबाजी शुरू हो गई।

गोटमार के दौरान दोनों पक्ष नदी के अलग-अलग किनारों पर जमा होते हैं और एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य नदी के बीच लगाए गए पलाश के झंडे पर कब्जा करना होता है। परंपरा के मुताबिक जिस पक्ष के लोग झंडे को अपने कब्जे में लेकर वापस अपने क्षेत्र में ले आते हैं, उसे विजेता माना जाता है।

सदियों पुरानी है परंपरा

पांढुर्णा की गोटमार परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इसे स्थानीय स्तर पर धार्मिक और पारंपरिक आयोजन के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, इसमें पत्थरबाजी होने के कारण हर साल सुरक्षा और लोगों की चोट को लेकर चिंता भी बनी रहती है।

शुक्रवार को आयोजन शुरू होने से पहले नदी के बीच पलाश का झंडा स्थापित किया गया और विधि-विधान से पूजा की गई। इसके बाद दोनों पक्षों के खिलाड़ी मैदान में उतर गए। देखते ही देखते जाम नदी का क्षेत्र पत्थरबाजी की आवाजों से गूंज उठा।

सुरक्षा के बीच आयोजन

गोटमार को देखते हुए प्रशासन और पुलिस की ओर से सुरक्षा व्यवस्था की गई है। आयोजन के दौरान किसी अप्रिय घटना को रोकने और स्थिति पर नजर रखने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया है। प्रशासन की कोशिश रहती है कि पारंपरिक आयोजन के दौरान कानून-व्यवस्था बनी रहे और गंभीर घटनाओं को रोका जा सके।

गोटमार के दौरान बड़ी संख्या में लोग नदी के आसपास पहुंचते हैं। पत्थरबाजी के चलते हर साल कई लोगों के घायल होने की घटनाएं सामने आती रही हैं। यही वजह है कि प्रशासन की निगरानी में आयोजन कराया जाता है।

फिलहाल पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष के लोग पलाश के झंडे पर कब्जे के लिए आमने-सामने हैं। जाम नदी में शुरू हुई इस अनोखी और जोखिम भरी परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे हैं।