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UCC के खिलाफ AIMIM की लड़ाई जारी, ओवैसी बोले- संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ

 

समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से 2029 से पहले NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने की बात कहे जाने के बाद AIMIM ने इसका विरोध और तेज कर दिया है। पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा है कि उनकी पार्टी समान नागरिक संहिता के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखेगी। ओवैसी ने UCC को संविधान के कई प्रावधानों और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं।

संविधान के अनुच्छेदों का दिया हवाला

ओवैसी ने UCC के विरोध में संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 का हवाला दिया। उनका कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखे बिना ऐसी व्यवस्था लागू नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि प्रस्तावित कानून से मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

AIMIM का तर्क है कि भारत की सामाजिक और धार्मिक विविधता को देखते हुए अलग-अलग समुदायों की व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ी परंपराओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। पार्टी UCC को लेकर अपनी आपत्ति सार्वजनिक मंचों पर लगातार रख रही है।

2029 से पहले UCC लागू करने की घोषणा

यह विवाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान के बाद और तेज हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। UCC का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की जगह समान कानूनी व्यवस्था लाना है।

फिलहाल उत्तराखंड में UCC लागू है, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में इससे जुड़े विधायी कदम आगे बढ़ चुके हैं। अलग-अलग राज्यों में प्रस्तावित या लागू प्रावधानों को लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की अलग-अलग राय है।

AIMIM ने NDA सहयोगियों से भी मांगा रुख

ओवैसी ने BJP के NDA सहयोगी दलों से भी UCC पर अपना स्पष्ट रुख सामने रखने की अपील की है। उनका कहना है कि जिन दलों की इस मुद्दे पर अलग राय है, उन्हें सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति बतानी चाहिए। वहीं कुछ NDA सहयोगी दलों ने भी UCC पर अंतिम रुख तय करने से पहले व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत बताई है।

UCC को लेकर केंद्र सरकार और इसके समर्थक इसे नागरिक कानूनों में समानता और एकरूपता से जोड़ते हैं, जबकि AIMIM समेत इसके विरोधी पक्ष धार्मिक स्वतंत्रता और विविध व्यक्तिगत कानूनों पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर अंतिम कानूनी और राजनीतिक प्रक्रिया संबंधित विधायी कदमों और न्यायिक परीक्षण के साथ आगे बढ़ेगी।