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21 साल बाद फिर वन विभाग लेगा शिकार की ट्रॉफियों का हिसाब, राजा-महाराजाओं के दौर के अवशेषों का मांगेगा ब्योरा

 

राजा-महाराजाओं के दौर में शिकार के बाद वन्यजीवों के अवशेषों से बनाई गई ट्रॉफियों का हिसाब वन विभाग अब 21 साल बाद फिर लेने जा रहा है। पुराने समय में शिकार के बाद जानवरों के सिर, सींग, खाल और अन्य अवशेषों को संरक्षित कर ट्रॉफी के रूप में रखा जाता था। ऐसी ट्रॉफियां कई राजघरानों और पुराने परिवारों के पास मौजूद हो सकती हैं। अब वन विभाग इनका रिकॉर्ड जुटाने की तैयारी कर रहा है।

इस पहल के तहत विभाग का उद्देश्य यह पता लगाना है कि पुराने समय में शिकार के बाद तैयार की गई वन्यजीवों की ट्रॉफियां वर्तमान में कहां और किसके पास रखी हैं। इनके बारे में उपलब्ध रिकॉर्ड और मौजूदा स्थिति का मिलान किया जाएगा।

पुराने शिकार की ट्रॉफियों का जुटाया जाएगा रिकॉर्ड

राजा-महाराजाओं के समय शिकार को शाही गतिविधियों का हिस्सा माना जाता था। उस दौर में शिकार किए गए वन्यजीवों के अवशेषों को यादगार के रूप में संरक्षित किया जाता था। कई जगह इन्हें सजावट के लिए भी रखा जाता था। समय के साथ ये ट्रॉफियां पुरानी हवेलियों, महलों और निजी संग्रहों का हिस्सा बन गईं।

वन्यजीवों के अवशेषों से बनी इन ट्रॉफियों का रिकॉर्ड रखना वन्यजीव संरक्षण और कानूनी निगरानी के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इसी कारण वन विभाग अब इनके बारे में जानकारी जुटाने की प्रक्रिया दोबारा शुरू कर रहा है।

21 साल बाद क्यों लिया जा रहा है हिसाब?

वन विभाग करीब 21 साल बाद इन ट्रॉफियों का हिसाब लेने जा रहा है। इससे पुराने रिकॉर्ड को अपडेट करने और यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि पहले दर्ज की गई ट्रॉफियां अब भी मौजूद हैं या नहीं। साथ ही, इनके रखरखाव और स्वामित्व से जुड़ी जानकारी भी सामने आ सकती है।

पुराने समय की ट्रॉफियों के मामले में यह जरूरी है कि उनके स्रोत और उपलब्ध दस्तावेजों की जानकारी स्पष्ट हो। वन्यजीवों के अवशेषों से जुड़ी वस्तुओं पर वन्यजीव संरक्षण कानून के प्रावधान लागू हो सकते हैं। इसलिए उनका रिकॉर्ड और कानूनी स्थिति महत्वपूर्ण है।

वन्यजीव संरक्षण से जुड़ा है मामला

वन्यजीवों के अवशेषों से बनी ट्रॉफियों का रिकॉर्ड जुटाने की कवायद को संरक्षण और निगरानी से जोड़कर देखा जा रहा है। विभाग के सामने यह पता लगाने की चुनौती होगी कि पुराने संग्रहों में रखी वस्तुओं का विवरण सरकारी रिकॉर्ड से मेल खाता है या नहीं।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं है कि वन विभाग इस बार सर्वे किस तरीके से करेगा और ट्रॉफियों का ब्योरा देने के लिए संबंधित लोगों को कितना समय दिया जाएगा। विभाग की आगे की प्रक्रिया और दिशा-निर्देश जारी होने के बाद इस अभियान की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।