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भोपाल गैस त्रासदी की 900 टन राख भी दफन, पीथमपुर में सुरक्षित लैंडफिल

 

भोपाल में 42 साल पहले हुई यूनियन कार्बाइड फैक्टरी गैस त्रासदी का एक और अध्याय समाप्त हो गया। वह हादसा जिसमें पांच हजार से अधिक लोगों की जान गई थी, अब उसके अवशेषों का निपटान भी पूरी तरह हो गया है। इंदौर के समीप पीथमपुर में पहले ही फैक्टरी के 337 टन विषैले कचरे को दफन किया जा चुका था। अब फैक्टरी से बची 900 टन राख को भी हमेशा के लिए सुरक्षित तरीके से लैंडफिल कर दिया गया है।

भोपाल गैस त्रासदी में फैक्टरी से निकली मिथाइल आइसोसाइनाइट गैस के कारण हजारों लोग प्रभावित हुए थे। विशेष रूप से उन गर्भवती महिलाओं की संतानों पर इसका असर देखा गया, जिन्होंने उस समय गैस की सांस ली थी। इस त्रासदी के अवशेष, राख के रूप में सुरक्षित नहीं थे और वर्षों तक पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिए खतरा बने हुए थे।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के निर्देश पर यह राख पीथमपुर में लैंडफिल की गई। अधिकारियों ने बताया कि यह लैंडफिल आबादी क्षेत्र से लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित है, ताकि आसपास की आबादी को किसी भी तरह का खतरा न हो। राख को सुरक्षित तरीके से दफन करने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह किसी भी प्रकार से पर्यावरण या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक न रहे।

इस कार्रवाई के बाद भोपाल गैस त्रासदी के वर्षों से लटके हुए इस महत्वपूर्ण अवशेष का सुरक्षित निपटान पूरा हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम न केवल पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उस दुखद घटना की याद को भी सुरक्षित और नियंत्रित तरीके से संभालने की दिशा में एक आवश्यक कदम है।

गौरतलब है कि भोपाल गैस त्रासदी भारत की सबसे बड़ी औद्योगिक आपदाओं में से एक थी, जिसने न केवल तत्काल मौतें और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कीं, बल्कि पीड़ित परिवारों और अगली पीढ़ियों पर भी दीर्घकालिक असर डाला। फैक्टरी की राख का सुरक्षित दफन, इस त्रासदी से जुड़े संरक्षण और सुरक्षा प्रयासों का अंतिम चरण माना जा रहा है।