एमपी की सड़कों पर मरने वालों में 41 फीसदी Gen-Z: पुलिसिया लापरवाही से 19% घायलों को नहीं मिला फ्री इलाज
मध्य प्रदेश में सड़क हादसों को लेकर सामने आए आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों में Gen-Z यानी युवा वर्ग की हिस्सेदारी करीब 41 प्रतिशत बताई जा रही है। वहीं हादसों में घायल हुए करीब 19 प्रतिशत लोगों को पुलिस स्तर पर हुई लापरवाही के कारण मुफ्त इलाज का लाभ नहीं मिल सका।
सड़क सुरक्षा से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं का सबसे गंभीर असर युवाओं पर पड़ रहा है। तेज रफ्तार, यातायात नियमों की अनदेखी, हेलमेट और सीट बेल्ट का इस्तेमाल नहीं करना तथा वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग जैसे कारण दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ाते हैं। युवा वर्ग में दोपहिया वाहनों की संख्या अधिक होने के कारण भी उनके गंभीर हादसों का शिकार होने की संभावना बढ़ जाती है।
सड़क हादसे के बाद घायल व्यक्ति को समय पर चिकित्सा सुविधा मिलना उसकी जान बचाने में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सरकार की ओर से सड़क दुर्घटना में घायलों को तत्काल मुफ्त उपचार उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। इसके बावजूद आंकड़ों के मुताबिक 19 प्रतिशत घायल इस सुविधा से वंचित रह गए।
मुफ्त इलाज नहीं मिलने के पीछे पुलिस स्तर पर होने वाली प्रक्रिया और लापरवाही को प्रमुख वजहों में शामिल किया जा रहा है। हादसे के बाद घायलों को अस्पताल पहुंचाने और आवश्यक औपचारिकताओं में देरी होने से कई बार इलाज प्रभावित होता है। गंभीर रूप से घायल व्यक्ति के लिए शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क दुर्घटना के बाद पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और एंबुलेंस सेवाओं के बीच बेहतर समन्वय होना जरूरी है। घायल को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाना और बिना देरी उपचार शुरू कराना प्राथमिकता होनी चाहिए।
युवाओं में सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने की जरूरत भी सामने आ रही है। कॉलेजों, स्कूलों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में यातायात नियमों को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है। हेलमेट और सीट बेल्ट के इस्तेमाल को लेकर भी सख्ती के साथ जागरूकता जरूरी है।
सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए तेज रफ्तार वाहनों पर नियंत्रण, शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई और ब्लैक स्पॉट की पहचान जैसे कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसके साथ ही खराब सड़कों, पर्याप्त रोशनी और यातायात संकेतों की कमी जैसी समस्याओं को भी दूर करना जरूरी है।
आंकड़े यह भी संकेत देते हैं कि सड़क सुरक्षा केवल पुलिस या परिवहन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। वाहन चालकों को भी नियमों का पालन करना होगा। एक छोटी सी लापरवाही कई बार परिवार को जीवनभर का दर्द दे देती है।
एमपी में सड़क हादसों में Gen-Z की 41 प्रतिशत हिस्सेदारी और घायल लोगों में 19 प्रतिशत को मुफ्त इलाज नहीं मिलने के आंकड़े व्यवस्था के सामने दोहरी चुनौती पेश करते हैं। एक ओर सड़क हादसों को रोकने की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर हादसे के बाद घायलों को तत्काल और निशुल्क इलाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है।
अब जरूरत इस बात की है कि सड़क सुरक्षा नियमों के पालन के साथ हादसे के बाद की चिकित्सा व्यवस्था में भी जवाबदेही तय हो। समय पर इलाज और बेहतर पुलिस-प्रशासनिक समन्वय से कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।