बालाघाट में संदिग्ध बीमारी से 3 महीने में 32 बैगा बच्चों की मौत, गांवों में दहशत; ग्रामीण बोले-सरकारी आंकड़े से ज्यादा हैं मामले
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में बैगा आदिवासी समुदाय के बच्चों की मौत का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि पिछले तीन महीनों में एक संदिग्ध बीमारी के चलते 32 बच्चों की मौत हो चुकी है। स्थानीय लोगों का दावा है कि मृतकों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा हो सकती है। प्रभावित गांवों में बीमारी और लगातार हो रही मौतों को लेकर लोगों में डर का माहौल है।
दैनिक भास्कर की टीम जब प्रभावित गांवों में पहुंची तो वहां बीमारी को लेकर ग्रामीणों की चिंता साफ नजर आई। ग्रामीणों के मुताबिक कई परिवारों ने बीमारी के कारण अपने बच्चों को खोया है। उनका कहना है कि समय पर इलाज और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलने से स्थिति गंभीर होती जा रही है।
बीमारी की वजह अभी स्पष्ट नहीं
बच्चों की मौत के पीछे किस बीमारी की भूमिका है, इसे लेकर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। स्थानीय स्तर पर अलग-अलग तरह की आशंकाएं जताई जा रही हैं। स्वास्थ्य विभाग की ओर से मामलों की जांच और मौतों के कारणों का पता लगाने की प्रक्रिया की जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि बीमारी के लक्षण सामने आने के बाद बच्चों की हालत तेजी से बिगड़ती है। दूरदराज के आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचना भी कई परिवारों के लिए चुनौती बना हुआ है।
ग्रामीणों का दावा-सरकारी आंकड़े से ज्यादा मौतें
प्रभावित गांवों के लोगों का दावा है कि 32 मौतों का आंकड़ा पूरी तस्वीर नहीं बताता। ग्रामीणों के मुताबिक कई मामलों की जानकारी सरकारी रिकॉर्ड तक नहीं पहुंच पाती। ऐसे में वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना बाकी है। सरकारी आंकड़ों और स्थानीय लोगों के दावों के बीच अंतर की स्थिति में प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की विस्तृत जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
गांवों में बीमारी का डर
लगातार बच्चों की मौत की खबरों के बाद प्रभावित इलाकों में अभिभावकों के बीच चिंता बढ़ गई है। ग्रामीण अपने बच्चों की सेहत को लेकर सतर्क हैं और बीमारी के कारणों को लेकर स्पष्ट जानकारी चाहते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए भी ऐसे मामलों में मौत के कारणों की वैज्ञानिक जांच जरूरी है, ताकि बीमारी की वास्तविक वजह सामने आ सके और संक्रमण या अन्य स्वास्थ्य जोखिम होने पर समय रहते रोकथाम के कदम उठाए जा सकें।