×

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर सुप्रीम कोर्ट में चौथे दिन सुनवाई, एक्सक्लुसीव फुटेज में देखें आस्था बनाम अधिकार पर बहस तेज

 

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को लगातार चौथे दिन सुनवाई हुई। इस दौरान मंदिर प्रबंधन और याचिकाकर्ताओं के बीच आस्था, परंपरा और समान अधिकारों को लेकर गहन बहस देखने को मिली।

<a style="border: 0px; overflow: hidden" href=https://youtube.com/embed/_DdjHRojQhU?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/_DdjHRojQhU/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden;" width="640">

मंदिर का प्रबंधन संभालने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि सबरीमाला मंदिर को सामान्य सार्वजनिक स्थानों से तुलना नहीं की जा सकती। बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि यह कोई खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट नहीं है, बल्कि एक विशेष धार्मिक आस्था से जुड़ा स्थान है, जहां परंपराओं का विशेष महत्व है।

सिंघवी ने कोर्ट को बताया कि सबरीमाला मंदिर के देवता भगवान अयप्पा को आजीवन ब्रह्मचारी माना जाता है। इसी मान्यता के आधार पर 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर परंपरागत रूप से प्रतिबंध लगाया गया है। उन्होंने कहा कि इस आयु वर्ग की महिलाओं की उपस्थिति मंदिर की मूल धार्मिक अवधारणा और देवता के स्वरूप के विपरीत मानी जाती है।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि भारत में भगवान अयप्पा के लगभग एक हजार मंदिर हैं, जहां महिलाओं के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है। ऐसे में यदि महिलाएं दर्शन करना चाहती हैं, तो वे अन्य मंदिरों में जा सकती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि केवल इसी विशेष मंदिर में प्रवेश की मांग क्यों की जा रही है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले की संवेदनशीलता को स्वीकार किया। कोर्ट ने कहा कि करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था को गलत ठहराना आसान नहीं है और यह न्यायपालिका के लिए सबसे जटिल कार्यों में से एक है। साथ ही कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म या परंपरा को पूरी तरह कमजोर नहीं किया जा सकता।

हालांकि, दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना समानता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उनका कहना है कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, और किसी भी धार्मिक प्रथा के नाम पर भेदभाव उचित नहीं ठहराया जा सकता।

यह मामला लंबे समय से देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है और इसमें आस्था तथा संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती सामने है। सुप्रीम कोर्ट की अंतिम टिप्पणी और फैसला इस बहस को नई दिशा दे सकता है।

अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कोर्ट इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या निर्णय देता है, जो भविष्य में धार्मिक परंपराओं और सामाजिक अधिकारों के बीच संतुलन तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।