SIR विवाद के बीच निशिकांत दुबे का दावा- हर 6 महीने में SIR चाहते थे नेहरू, पैसे की कमी से नहीं हो सका
देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी विवाद के बीच बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने इसका बचाव किया है। दुबे ने दावा किया कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी हर छह महीने में SIR कराना चाहते थे, लेकिन उस समय पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं होने के कारण ऐसा नहीं हो सका।निशिकांत दुबे के मुताबिक, 1951 के चुनाव कानून में हर छह महीने पर SIR कराने का प्रावधान था। उन्होंने कहा कि नेहरू इस व्यवस्था को नियमित रूप से लागू करना चाहते थे, लेकिन प्रक्रिया में होने वाले खर्च को देखते हुए इसे आगे बढ़ाना संभव नहीं हुआ। बाद में मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर अलग व्यवस्था बनी।
SIR को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि मौजूदा प्रक्रिया में मतदाताओं के नाम हटने और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर चिंताएं हैं। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग SIR को मतदाता सूची को अपडेट करने और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के तौर पर पेश कर रहा है।दुबे ने अपने बयान में मौजूदा विवाद के साथ चुनाव आयोग को लेकर उठाए जा रहे सवालों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आयोग की ओर से आरोपों का जवाब दिया जा चुका है। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर लगाए जा रहे आरोपों पर आयोग का पक्ष भी सामने आना चाहिए।
SIR को लेकर राजनीतिक बयानबाजी ऐसे समय में तेज हुई है, जब अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं। विवाद का एक प्रमुख मुद्दा यह है कि पुनरीक्षण के दौरान किन दस्तावेजों और प्रक्रियाओं के आधार पर मतदाताओं के नामों का सत्यापन किया जाए।निशिकांत दुबे का बयान इसी व्यापक बहस के बीच आया है। उनके नेहरू से जुड़े दावे को फिलहाल उनके बयान के रूप में ही देखा जा रहा है। SIR की मौजूदा प्रक्रिया और इसके ऐतिहासिक संदर्भ को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों के अपने-अपने तर्क हैं।