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शिमला IGMC में बेहद दुर्लभ मामला, गर्भवती महिला के भ्रूण में मिला दूसरा अविकसित भ्रूण

 

हिमाचल प्रदेश के शिमला स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (IGMC) में फीटस इन फीटू (Fetus in Fetu) का बेहद दुर्लभ मामला सामने आया है। यहां 20 वर्षीय गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण के मुंह और जबड़े के पास एक दूसरी अविकसित भ्रूण जैसी संरचना दिखाई दी। डॉक्टरों ने इमेजिंग जांच के जरिए गर्भावस्था के दौरान ही इस असामान्यता की पहचान की।

यह मामला चिकित्सा जगत में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि फीटस इन फीटू एक अत्यंत दुर्लभ स्थिति है, जिसमें एक भ्रूण जैसी संरचना दूसरे भ्रूण के शरीर के भीतर विकसित होती पाई जाती है।

सोनोग्राफी में सामने आई असामान्यता

जानकारी के अनुसार, 20 वर्षीय महिला की गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच की जा रही थी। सोनोग्राफी के दौरान डॉक्टरों को गर्भ में पल रहे भ्रूण के चेहरे के आसपास कुछ असामान्य दिखाई दिया।

जांच में भ्रूण के मुंह और जबड़े के पास दूसरी अविकसित भ्रूण जैसी संरचना नजर आई। इसके बाद डॉक्टरों ने स्थिति को और स्पष्ट करने के लिए इमेजिंग तकनीक की मदद ली।

गर्भ में ही हुई दुर्लभ स्थिति की पहचान

डॉक्टरों के लिए इस मामले की सबसे खास बात यह रही कि असामान्यता की पहचान गर्भ में ही कर ली गई। आमतौर पर इस तरह की दुर्लभ स्थिति का पता जन्म के बाद जांच के दौरान चल सकता है, लेकिन इस मामले में इमेजिंग के जरिए गर्भावस्था के दौरान ही डॉक्टरों को संकेत मिल गया।

विशेषज्ञों ने जांच के आधार पर इसे फीटस इन फीटू की संभावित स्थिति के रूप में देखा। इस तरह के मामलों में चिकित्सा विशेषज्ञों की निगरानी और विस्तृत जांच बेहद महत्वपूर्ण होती है।

क्या होता है फीटस इन फीटू?

फीटस इन फीटू एक अत्यंत दुर्लभ जन्मजात स्थिति है। इसमें जुड़वा भ्रूणों के विकास के दौरान एक भ्रूण दूसरे भ्रूण के शरीर के भीतर फंस जाता है और पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता।

ऐसे मामलों में अविकसित भ्रूण जैसी संरचना दूसरे भ्रूण के शरीर के किसी हिस्से में पाई जा सकती है। यह स्थिति बेहद कम मामलों में सामने आती है और इसके प्रबंधन के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी जरूरी होती है।

डॉक्टरों की निगरानी में मामला

IGMC शिमला में सामने आए इस मामले ने चिकित्सा क्षेत्र में भी ध्यान खींचा है। डॉक्टर इमेजिंग रिपोर्ट और अन्य चिकित्सकीय जांच के आधार पर भ्रूण की स्थिति का आकलन कर रहे हैं।

गर्भावस्था के दौरान ऐसी असामान्यता की पहचान होने से डॉक्टरों को आगे की चिकित्सा रणनीति तैयार करने में मदद मिलती है। इस तरह के मामलों में गर्भवती महिला और भ्रूण दोनों की स्थिति पर लगातार नजर रखना जरूरी होता है।

फिलहाल यह मामला दुर्लभ होने के कारण चर्चा में है। डॉक्टरों की विस्तृत जांच और आगे की चिकित्सा प्रक्रिया से ही यह स्पष्ट होगा कि गर्भ में मौजूद अविकसित संरचना की प्रकृति क्या है और प्रसव के बाद इसके प्रबंधन के लिए किस तरह की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।