₹60 रोज से राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार तक पहुंची सुमन गोयल की कहानी, पढ़ाई का जुनून बना सफलता की वजह
कहते हैं कि हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो इंसान अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है। दिल्ली की सरकारी स्कूल शिक्षिका सुमन गोयल की कहानी इसका उदाहरण है। आर्थिक परेशानियों के बीच पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्होंने कभी रोजाना सिर्फ 60 रुपये में बच्चों को पढ़ाया था। आज वही सुमन गोयल राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं और राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चुनी गईं। शिक्षा के प्रति उनकी मेहनत, बच्चों के लिए किए गए काम और पढ़ाने के नए तरीकों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।
आर्थिक तंगी के बीच जारी रखी पढ़ाई
सुमन गोयल मूल रूप से हरियाणा के जींद जिले के जुलाना गांव की रहने वाली हैं। बचपन से ही पढ़ाई में उनकी रुचि थी और वह डॉक्टर बनने का सपना देखती थीं। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उनकी पढ़ाई के सामने मुश्किलें खड़ी हो गईं। परिवार को दिल्ली आना पड़ा और सुमन ने परिस्थितियों के बीच पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया।
उन्होंने साल 2002 में 12वीं की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में बीए में दाखिला लिया। कॉलेज की फीस और पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए उन्होंने उसी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, जहां से उन्होंने अपनी 12वीं की पढ़ाई की थी।
60 रुपये रोज से शुरू हुआ सफर
सुमन ने पढ़ाई के साथ अस्थायी तौर पर बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया। उस समय उन्हें रोजाना करीब 60 रुपये मिलते थे। साल 2004 तक उनकी मासिक आमदनी लगभग 1200 से 1300 रुपये थी। वह इसी कमाई से अपनी कॉलेज की पढ़ाई का खर्च निकालती थीं।
आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई और शिक्षक बनने के अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा। स्कूल के शिक्षकों से मार्गदर्शन लेकर उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की और साल 2009 में उन्हें सरकारी शिक्षक की नौकरी मिली।
जिस स्कूल से पढ़ीं, वहीं बनीं शिक्षिका
साल 2013 से सुमन गोयल उसी स्कूल में प्राथमिक शिक्षिका के तौर पर सेवाएं दे रही हैं, जहां उन्होंने कभी छात्रा के रूप में पढ़ाई की थी। दिल्ली के पूठ कलां स्थित जीएसकेवी में वह बच्चों को पढ़ाने के साथ उनकी व्यक्तिगत जरूरतों पर भी ध्यान देती हैं। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार की आधिकारिक सूची में भी सुमन गोयल का नाम दिल्ली के इसी स्कूल के साथ दर्ज है।
सुमन खुद को बच्चों की ‘मदर टीचर’ के तौर पर देखती हैं। उनके स्कूल में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे पढ़ते हैं, जिनके परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं। ऐसे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए वह किताबों, स्टेशनरी, स्वेटर और दूसरी जरूरतों में भी मदद करती हैं।
गणित की मुश्किल आसान करने के लिए बनाई मैथ्स किट
सुमन ने पढ़ाई को बच्चों के लिए आसान और रुचिकर बनाने के लिए कई नए तरीके अपनाए। खासतौर पर कमजोर विद्यार्थियों और विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए उन्होंने अलग रणनीतियां विकसित कीं।
उन्होंने बच्चों को गणित समझाने के लिए ‘निपुण मैथ्स किट’ भी तैयार की। इसका उद्देश्य बच्चों को खेल और गतिविधियों के जरिए गणित की बुनियादी अवधारणाएं समझाना है। उनके इन प्रयासों को राज्य स्तर पर भी सराहना मिली।
2022 में राज्य पुरस्कार, अब राष्ट्रीय सम्मान
सुमन गोयल की मेहनत को पहले भी पहचान मिल चुकी है। साल 2022 में उन्हें स्टेट टीचर्स अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। इसके बाद राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए देशभर से चुने गए 48 शिक्षकों में उनका नाम शामिल किया गया।
5 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्रदान किए। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार इस साल देशभर के 48 स्कूली शिक्षकों को तीन चरणों वाली चयन प्रक्रिया के बाद चुना गया था।
सुमन गोयल की कहानी बताती है कि आर्थिक कठिनाइयां किसी व्यक्ति की मंजिल तय नहीं करतीं। रोज 60 रुपये से अपने शिक्षक जीवन की शुरुआत करने वाली सुमन ने पढ़ाई जारी रखी, सरकारी शिक्षक बनीं और अंततः उसी स्कूल में लौटकर बच्चों का भविष्य संवारने लगीं, जहां कभी उन्होंने खुद शिक्षा हासिल की थी। यही सफर आज उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार तक लेकर पहुंचा है।