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हरियाणा में गैर-जाट और गैर-जाटव वोटों पर बीजेपी का फोकस, खट्टर के बाद नायब सैनी बढ़ा रहे रणनीति

 

हरियाणा की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। वर्ष 2014 में मनोहर लाल खट्टर के मुख्यमंत्री बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने गैर-जाट और गैर-जाटव समुदायों के बीच अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की रणनीति पर विशेष जोर दिया। अब मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी इसी राजनीतिक रणनीति को आगे बढ़ाते नजर आ रहे हैं।

बीजेपी की कोशिश लंबे समय से ऐसे सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ने की रही है, जो पारंपरिक तौर पर किसी एक दल के मजबूत वोट बैंक माने जाते रहे हैं। पार्टी ने अलग-अलग समुदायों के बीच संगठनात्मक पहुंच बढ़ाने और राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के जरिए अपना आधार विस्तार करने की कोशिश की है।

2014 के बाद बदली बीजेपी की रणनीति

हरियाणा में 2014 का विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस चुनाव के बाद मनोहर लाल खट्टर राज्य के मुख्यमंत्री बने। इसके साथ ही पार्टी ने राज्य की राजनीति में जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर विभिन्न गैर-जाट समुदायों को अपने साथ जोड़ने पर जोर दिया।

बीजेपी ने संगठन में अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने के साथ सरकार और पार्टी के स्तर पर भी नए राजनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश की। इसका उद्देश्य राज्य में अपने लिए व्यापक सामाजिक समर्थन तैयार करना था।

गैर-जाट समुदायों पर विशेष ध्यान

हरियाणा की राजनीति में जाट समुदाय का लंबे समय से महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। ऐसे में बीजेपी ने गैर-जाट समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति अपनाई। पार्टी ने विभिन्न पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति के गैर-जाटव समूहों और अन्य सामाजिक वर्गों तक अपनी पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया।

राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से यह रणनीति बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण रही है, क्योंकि अलग-अलग छोटे और मध्यम सामाजिक समूहों को एक साथ जोड़कर पार्टी व्यापक वोट आधार तैयार करने की कोशिश करती रही है।

नायब सैनी के नेतृत्व में जारी रणनीति

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में भी बीजेपी इसी सामाजिक समीकरण को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। सैनी खुद ओबीसी समुदाय से आते हैं और पार्टी के भीतर उनका नेतृत्व गैर-जाट वोटरों को साधने की रणनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है।

सरकार और संगठन की गतिविधियों में विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही पार्टी की कोशिश है कि अलग-अलग समुदायों के बीच यह संदेश पहुंचे कि बीजेपी उनके राजनीतिक और सामाजिक हितों को प्राथमिकता दे रही है।

चुनावी राजनीति में कितना असर

हरियाणा में किसी भी चुनाव के दौरान जातीय समीकरण बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में गैर-जाट और गैर-जाटव समुदायों को अपने साथ बनाए रखना बीजेपी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।

हालांकि, केवल जातीय समीकरण चुनाव परिणाम तय नहीं करते। बेरोजगारी, विकास, किसानों के मुद्दे, कानून-व्यवस्था, सरकारी योजनाओं और स्थानीय समस्याओं का भी मतदाताओं के फैसले पर असर पड़ता है।

बीजेपी की मौजूदा रणनीति का लक्ष्य अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच अपने समर्थन को मजबूत बनाए रखना है। खट्टर के मुख्यमंत्री बनने के बाद शुरू हुई गैर-जाट और गैर-जाटव समुदायों को साथ लाने की कोशिश अब नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में आगे बढ़ रही है। आने वाले चुनावों में यह रणनीति बीजेपी के लिए कितनी प्रभावी साबित होती है, इसका फैसला मतदाताओं के रुख से होगा।