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भारत में उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव का मुद्दा फिर सुर्खियों में, NSUI प्रमुख ने उठाए सवाल

 

भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की स्थिति एक बार फिर गंभीर बहस का केंद्र बन गई है। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ (NSUI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरुण चौधरी ने उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के खिलाफ बढ़ते भेदभाव को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।

वरुण चौधरी ने कहा कि हाल ही में किए गए सर्वेक्षण और शोध में यह सामने आया है कि कई विश्वविद्यालय और कॉलेज जातिगत आधार पर छात्रों और शिक्षकों के साथ असमान व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह भेदभाव केवल प्रवेश और भर्ती प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि शैक्षणिक अवसर, पदोन्नति, छात्रावास सुविधाओं और शोध परियोजनाओं तक फैल गया है।

NSUI अध्यक्ष ने चिंता जताते हुए बताया कि उच्च शिक्षा में इस भेदभाव के कारण अधिक योग्य और प्रतिभाशाली छात्रों को अवसर नहीं मिल रहे, जिससे उनकी शैक्षणिक और पेशेवर प्रगति प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा, “अगर यह रुझान जारी रहा, तो भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में समानता और न्याय की अवधारणा खतरे में पड़ सकती है।”

वरुण चौधरी ने इस मुद्दे पर कड़े कदम उठाने की मांग की। उनका कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारों के साथ यूजीसी और अन्य नियामक संस्थानों को इस भेदभाव पर गहन जांच और निगरानी करनी चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि साफ-सुथरे दिशा-निर्देश और कड़े अनुशासनात्मक प्रावधान लागू किए जाएं, ताकि जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म किया जा सके।

विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च शिक्षा में समान अवसर और समावेशिता सुनिश्चित करना भारत के संविधान और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का अनिवार्य हिस्सा है। उन्होंने चेताया कि यदि जातिगत भेदभाव को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह शैक्षणिक असंतोष, सामाजिक तनाव और विरोध प्रदर्शन का कारण बन सकता है।

छात्र संगठनों का कहना है कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे नीतिगत सुधार, शिक्षा नीतियों की समीक्षा और निगरानी तंत्र के माध्यम से हल करना आवश्यक है। वरुण चौधरी ने भी इस दिशा में सकारात्मक कदमों और जागरूकता अभियानों की जरूरत पर जोर दिया।

कुल मिलाकर, भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव का मुद्दा अब राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है। NSUI प्रमुख के खुलासों ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञ, छात्र संगठन और नागरिक समाज इस पर संवाद और सुधार की मांग कर रहे हैं, ताकि भारत के उच्च शिक्षा संस्थान समानता, न्याय और अवसर के मूल्यों के अनुरूप काम कर सकें।