पारा 40 हो या 45 छत्तीसगढ़ का यह सुपरफूड है गर्मी का दुश्मन और पोषण का पिटारा
गर्मियों में जब तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तब शरीर को ठंडक और ऊर्जा देने वाले पारंपरिक खाद्य पदार्थों का महत्व बढ़ जाता है। छत्तीसगढ़ में ऐसा ही एक सुपरफूड है कोदो-कुटकी, जिसे पोषण का पिटारा और गर्मी का प्राकृतिक साथी माना जाता है। इसके अलावा कई आदिवासी क्षेत्रों में इसे स्वास्थ्यवर्धक आहार के रूप में पीढ़ियों से इस्तेमाल किया जा रहा है।
गर्मी में क्यों फायदेमंद है यह सुपरफूड?
कोदो और कुटकी जैसे मोटे अनाज शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा देने के साथ पाचन तंत्र को भी बेहतर बनाए रखते हैं। इनमें फाइबर की मात्रा अधिक होती है, जिससे पेट लंबे समय तक भरा रहता है और शरीर में पानी की कमी का असर कम महसूस होता है।
पोषक तत्वों से भरपूर
यह पारंपरिक अनाज कई महत्वपूर्ण पोषक तत्वों का स्रोत माना जाता है, जिनमें शामिल हैं:
- फाइबर
- प्रोटीन
- आयरन
- कैल्शियम
- एंटीऑक्सीडेंट
- आवश्यक खनिज
इन गुणों के कारण इसे संतुलित आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
मधुमेह और वजन नियंत्रण में भी सहायक
विशेषज्ञों के अनुसार, मोटे अनाजों का ग्लाइसेमिक इंडेक्स अपेक्षाकृत कम होता है। यही कारण है कि इन्हें मधुमेह रोगियों और वजन नियंत्रित करने वाले लोगों के लिए भी लाभकारी माना जाता है।
छत्तीसगढ़ की परंपरा से जुड़ा आहार
Chhattisgarh के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में कोदो-कुटकी से बनी खिचड़ी, भात, रोटी और अन्य पारंपरिक व्यंजन आज भी लोकप्रिय हैं। हाल के वर्षों में इन अनाजों की मांग देश और विदेश में भी बढ़ी है।
विशेषज्ञ भी दे रहे हैं महत्व
पोषण विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती गर्मी और बदलती जीवनशैली के दौर में ऐसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों को दैनिक भोजन में शामिल करना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है।
किसानों के लिए भी फायदेमंद
कोदो और कुटकी जैसी फसलें कम पानी में भी उगाई जा सकती हैं। यही वजह है कि इन्हें जलवायु परिवर्तन के दौर में टिकाऊ कृषि का महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है।
गर्मी के मौसम में शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए छत्तीसगढ़ का यह पारंपरिक सुपरफूड एक बेहतरीन विकल्प माना जा रहा है। स्वाद, पोषण और सेहत—तीनों का संतुलन इसमें देखने को मिलता है।