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अदालत के फैसले से हमारी सोच नहीं बदलेगी; बघेल ने झीरम हमला मामले में कोर्ट के फैसले को क्यों बताया अधूरा
 

 

छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी हमले के मामले में 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने अदालत के फैसले को ‘अधूरा न्याय’ बताया है। उनका कहना है कि अदालत ने जिन लोगों के खिलाफ सबूत मिले, उन्हें सजा दी है, लेकिन हमले के पीछे की बड़ी साजिश और कथित मुख्य साजिशकर्ताओं तक जांच नहीं पहुंच पाई।

जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने 16 सितंबर को 2013 के झीरम घाटी माओवादी हमले के मामले में 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी। इससे पहले 5 सितंबर को अदालत ने सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया था। 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए इस हमले में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं समेत बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी।

फैसले के बाद भूपेश बघेल ने कहा कि अदालत के फैसले से उनकी सोच नहीं बदलेगी। उनके मुताबिक, जिन लोगों को सजा मिली है, वे हमले को अंजाम देने वाले निचले स्तर के कैडर हैं, जबकि इस हमले की योजना बनाने वाले वरिष्ठ माओवादी नेताओं की भूमिका की पूरी तरह जांच नहीं हुई। बघेल ने आरोप लगाया कि बड़ी साजिश की जांच अधूरी रह गई है।

बघेल ने यह भी दावा किया कि जांच के शुरुआती चरण में कुछ वरिष्ठ माओवादी नेताओं के नाम सामने आए थे, लेकिन बाद की कार्रवाई में उनके खिलाफ आरोप आगे नहीं बढ़े। उनका कहना है कि जब तक हमले की पूरी साजिश और उसके पीछे मौजूद लोगों की भूमिका सामने नहीं आती, तब तक इसे पूर्ण न्याय नहीं माना जा सकता। ये बघेल और कांग्रेस की ओर से लगाए गए आरोप हैं।

झीरम घाटी मामले को लेकर कांग्रेस लंबे समय से बड़ी साजिश की जांच की मांग करती रही है। 2019 में तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार ने मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन भी किया था। बाद में इस जांच को लेकर एनआईए और राज्य सरकार के बीच कानूनी विवाद भी सामने आया।

वहीं, छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने बघेल की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि जब बघेल मुख्यमंत्री थे, तब वे झीरम मामले से जुड़े सबूत होने की बात कहते थे। शर्मा ने सवाल किया कि यदि उनके पास अतिरिक्त सबूत थे तो उन्हें जांच एजेंसी के सामने क्यों नहीं रखा गया। उन्होंने कहा कि किसी के पास इस मामले से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी या सबूत हैं तो उन्हें एनआईए के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

इस बीच, झीरम हमले के पीड़ित परिवारों की ओर से भी आगे जांच की मांग उठ रही है। कुछ परिजनों ने कथित तौर पर उन वरिष्ठ माओवादी नेताओं की भूमिका की जांच की मांग की है, जिन्होंने बाद में आत्मसमर्पण किया। ऐसे में अदालत के फैसले के बाद भी हमले की कथित बड़ी साजिश और अन्य संदिग्धों की भूमिका को लेकर बहस जारी है।

अदालत के फैसले के खिलाफ दोषियों के पास ऊपरी अदालत में अपील का कानूनी विकल्प मौजूद है। वहीं, झीरम मामले में मौत की सजा पर भी आगे की न्यायिक प्रक्रिया होगी। ऐसे में 13 साल पुराने इस मामले में अदालत का फैसला आने के बावजूद इससे जुड़े कई कानूनी और जांच संबंधी सवाल आने वाले दिनों में चर्चा में बने रह सकते हैं।