बस्तर दशहरा 2025, देवी की अनुमति से शुरू होती है सुरक्षा और परंपरा की अनोखी परंपरा
बस्तर दशहरा (Bastar Dussehra 2025) केवल त्योहार ही नहीं बल्कि सुरक्षा और परंपरा का अनोखा मेल है। इस पर्व में शामिल होने से पूर्व मांई दंतेश्वरी और मावली माता न सिर्फ स्थानीय देवी-देवताओं से अनुमति लेती हैं, बल्कि नगर और इलाके की रक्षा का दायित्व भी ग्रहण करती हैं।
ग्राम रक्षक से अनुमति लेना अनिवार्य
परंपरा के अनुसार, देवी मांई दंतेश्वरी और मावली माता सबसे पहले ग्राम रक्षक घाट भैरव देव और बोदराज बाबा से अनुमति लेती हैं। इसका मतलब यह है कि पर्व में किसी भी गतिविधि या आयोजन को देवताओं के आशीर्वाद के बिना शुरू नहीं किया जा सकता।
सुरक्षा का दायित्व
देवी केवल पर्व के समय ही नहीं, बल्कि लौटने तक नगर और इलाके की रक्षा का दायित्व भी निभाती हैं। इस अनोखी परंपरा से यह सुनिश्चित होता है कि पर्व की अवधि में सुरक्षा और व्यवस्था बनी रहे।
पालकी का प्रवेश भी अनुमति पर आधारित
बस्तर दशहरा पर्व से लौटने के बाद भी देवी की पालकी मंदिर में देवों की अनुमति के बाद ही प्रवेश करती है। यह परंपरा न केवल धार्मिक महत्व रखती है बल्कि सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखने का भी माध्यम है।
अनूठी सांस्कृतिक विरासत
बस्तर दशहरा की यह परंपरा स्थानीय संस्कृति और विश्वास का जीवंत उदाहरण है। इसे देख कर यह स्पष्ट होता है कि यहाँ के लोग न केवल त्योहारों को उल्लास और भक्ति के साथ मनाते हैं बल्कि सुरक्षा, व्यवस्था और परंपरा का भी पूरी तरह ध्यान रखते हैं।