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कोरोना संकट से बनी आत्मनिर्भरता की कहानी: मछली के अचार ने बदली महिलाओं की किस्मत

 

जब कोरोना महामारी ने देशभर में लॉकडाउन की मार डाली, तब सबसे ज्यादा असर छोटे कारोबारियों और दैनिक आय पर निर्भर लोगों पर पड़ा। इसी दौर में मछली पालन और बिक्री से जुड़ी एक महिला के सामने भी बड़ा संकट खड़ा हो गया। बाजार बंद थे, मछली की बिक्री ठप हो चुकी थी और आमदनी का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। लेकिन इसी मुश्किल समय में उन्होंने हालात से हार मानने के बजाय एक नई राह चुनी, जिसने न सिर्फ उनकी जिंदगी बदली बल्कि उनके मोहल्ले की कई महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बना दिया।

कोरोना के दौरान जब ताजी मछली की बिक्री संभव नहीं हो पा रही थी, तब उन्होंने मछली को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के विकल्पों पर काम शुरू किया। इसी सोच के तहत उन्होंने फिश पिकल यानी मछली का अचार बनाने की तकनीक को अपनाया। शुरुआत में यह प्रयोग घरेलू स्तर पर किया गया, लेकिन जब इसका स्वाद लोगों को पसंद आने लगा, तो मांग धीरे-धीरे बढ़ने लगी। अचार की खासियत यह रही कि यह लंबे समय तक खराब नहीं होता और स्वाद में भी पारंपरिक मसालों की झलक बनी रहती है।

सबसे अहम बात यह रही कि उन्होंने इस काम को अकेले तक सीमित नहीं रखा। अपने अनुभव और सीख को साझा करते हुए उन्होंने अपने मोहल्ले की महिलाओं को भी मछली का अचार बनाने की ट्रेनिंग देना शुरू किया। धीरे-धीरे कई महिलाएं इस काम से जुड़ गईं और यह एक छोटे समूह के रूप में उभरने लगा। महिलाओं ने घर बैठे ही काम करना शुरू किया, जिससे उन्हें आर्थिक सहयोग मिला और आत्मविश्वास भी बढ़ा।

समय के साथ मछली के अचार की गुणवत्ता और स्वाद की पहचान बनने लगी। स्थानीय बाजारों के अलावा अब इसकी डिमांड दूसरे शहरों तक पहुंच चुकी है। लोग खास तौर पर घर में बने, बिना केमिकल वाले फिश पिकल को पसंद कर रहे हैं। सोशल मीडिया और मुंहजबानी प्रचार के जरिए इस उत्पाद ने नई पहचान बनाई है।

आज यह पहल सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की मिसाल बन चुकी है। जहां एक ओर कोरोना संकट ने लोगों को बेरोजगारी की ओर धकेला, वहीं दूसरी ओर इस नवाचार ने कई परिवारों की आजीविका को संभाल लिया। महिलाएं अब न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं, बल्कि अपने फैसले खुद लेने में भी सक्षम बन रही हैं।

यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि संकट के समय सही सोच और मेहनत से नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। मछली के अचार ने यह दिखा दिया कि आत्मनिर्भरता की राह छोटे प्रयासों से भी शुरू हो सकती है और उसका असर दूर-दूर तक पहुंच सकता है।