वोटर लिस्ट पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी मुहर, फुटेज में जाने बिहार समेत 5 राज्यों में SIR प्रक्रिया को बताया वैध
देश की चुनावी व्यवस्था को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए बिहार समेत पांच राज्यों में कराए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) अभियान को पूरी तरह वैध और संवैधानिक करार दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है और इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए साफ और प्रमाणिक वोटर लिस्ट बेहद जरूरी है। ऐसे में चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर किए जाने वाले पुनरीक्षण अभियान संविधान के दायरे में आते हैं। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग को संविधान के तहत स्वतंत्र अधिकार प्राप्त हैं और वह निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठा सकता है।
दरअसल, बिहार समेत पांच राज्यों में चुनाव के दौरान चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चलाया था। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में दर्ज लोगों के दस्तावेजों की जांच की गई थी। जिन व्यक्तियों की नागरिकता संदिग्ध पाई गई या जिनके रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिली, उनके नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए थे। इसी कार्रवाई को लेकर कई याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनमें आरोप लगाया गया था कि यह प्रक्रिया मनमानी और भेदभावपूर्ण है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि चुनाव आयोग का उद्देश्य केवल मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना था। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संदेह पैदा होता है तो आयोग को जांच करने और उचित कार्रवाई करने का अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करती है, न कि कमजोर।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में चुनाव आयोग को एक महत्वपूर्ण निर्देश भी दिया। अदालत ने कहा कि जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनकी सूची चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को भेजी जाए। कोर्ट का मानना है कि ऐसे मामलों में आगे की जांच और आवश्यक कार्रवाई केंद्र सरकार के स्तर पर की जानी चाहिए।
बता दें कि चुनाव आयोग ने करीब 11 महीने पहले बिहार से इस विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान की शुरुआत की थी। उस समय बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले थे और आयोग ने मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए बड़े स्तर पर दस्तावेजों की जांच शुरू की थी। बाद में इसी प्रक्रिया को अन्य राज्यों में भी लागू किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनाव आयोग के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। राजनीतिक और कानूनी जानकारों का कहना है कि इस निर्णय से भविष्य में चुनावी प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने में मदद मिलेगी। वहीं, विपक्षी दलों की ओर से इस मुद्दे पर आगे भी राजनीतिक बहस जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।