‘SIR, NRC जैसी प्रक्रिया’, सुप्रीम कोर्ट की चुनाव आयोग को सख्त टिप्पणी; कहा- ‘नागरिकता तय करना EC का काम नहीं’
Supreme Court of India ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग को अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का अधिकार क्षेत्र नहीं है। अदालत ने साफ कहा कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संदेह है, तो उसका निर्णय संबंधित सक्षम प्राधिकरण द्वारा किया जाना चाहिए, न कि चुनाव आयोग द्वारा।
सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को बिहार समेत पांच राज्यों में लागू की गई SIR प्रक्रिया को लेकर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने कई अहम सवाल उठाए और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि SIR प्रक्रिया कई मायनों में NRC जैसी प्रतीत होती है, इसलिए इसमें बेहद सावधानी बरतने की जरूरत है।
मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि Election Commission of India मतदाता सूची का पुनरीक्षण कर सकता है, लेकिन वह किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं दे सकता। अदालत ने कहा, “अगर किसी व्यक्ति की नागरिकता पर शक है, तो मामला उचित सरकारी अथॉरिटी के पास भेजा जाना चाहिए।”
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि SIR प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं, जिससे नागरिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को बिना उचित प्रक्रिया अपनाए वोटर लिस्ट से बाहर नहीं किया जा सकता।
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने के लिए विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया अपने आप में असंवैधानिक नहीं कही जा सकती, लेकिन इसका इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनकी जानकारी निर्धारित समयसीमा में केंद्र सरकार को भेजी जाए ताकि आगे उचित प्रक्रिया अपनाई जा सके।
गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने करीब 11 महीने पहले बिहार से SIR प्रक्रिया की शुरुआत की थी। बाद में इसे अन्य राज्यों में भी लागू किया गया। विपक्षी दलों और कुछ संगठनों ने इस प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई थी और आरोप लगाया था कि यह NRC जैसी व्यवस्था की ओर कदम हो सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत ने चुनाव आयोग की सीमाएं स्पष्ट करते हुए नागरिकता और मतदाता अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया है।