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बिहार में आर्थिक संकट के संकेत? किश्तों में वेतन-पेंशन, जीविका दीदियों को पैसों का इंतजार; बड़े प्रोजेक्ट्स की रफ्तार भी धीमी

 

बिहार की सम्राट चौधरी सरकार के सामने वित्तीय मोर्चे पर कई चुनौतियां खड़ी होने के सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों के वेतन और पेंशन के भुगतान में देरी या किश्तों में भुगतान की चर्चा के बीच जीविका दीदियों को भी राशि का इंतजार करना पड़ा है। दूसरी ओर, कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स की रफ्तार धीमी पड़ने और इंक्रीमेंट अटकने की खबरों ने सरकार की वित्तीय स्थिति को लेकर बहस तेज कर दी है। हालांकि, इन परिस्थितियों को सीधे तौर पर राज्य में आर्थिक संकट की पुष्टि मानना जल्दबाजी होगी।

जीविका योजना को लेकर हाल में सरकार की ओर से बड़ी राशि जारी भी की गई है। 27 अगस्त को पांच लाख जीविका दीदियों के खातों में कुल 600 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए गए। इनमें चार लाख महिलाओं को पहली और एक लाख को दूसरी किस्त मिली। इससे यह साफ है कि सरकार की ओर से योजना के तहत भुगतान जारी है, हालांकि किस्तों में राशि मिलने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

वेतन-पेंशन के भुगतान पर सवाल

सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए समय पर भुगतान बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में यदि वेतन या पेंशन किस्तों में मिलने की स्थिति बनती है तो इससे सरकारी खजाने की नकदी प्रबंधन व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, किसी राज्य की आर्थिक स्थिति का आकलन केवल भुगतान में देरी के आधार पर नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार को हर महीने वेतन, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और विकास परियोजनाओं पर बड़ी राशि खर्च करनी होती है। इसके साथ ही सरकार पर विभिन्न योजनाओं और निर्माण कार्यों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी होती है।

जीविका दीदियों के भुगतान पर भी नजर

बिहार में जीविका अभियान ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ने और उन्हें आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने का बड़ा माध्यम बन चुका है। सरकार ने हाल में पांच लाख महिलाओं के लिए 600 करोड़ रुपए जारी किए हैं। साथ ही 10 हजार महिलाओं को जीविका निधि के माध्यम से कुल 50 करोड़ रुपए का ऋण देने की घोषणा भी की गई।

इससे संकेत मिलता है कि सरकार महिला समूहों से जुड़ी योजनाओं पर खर्च जारी रख रही है। ऐसे में किसी विशेष किस्त में देरी और व्यापक आर्थिक संकट के बीच अंतर करना जरूरी है।

बड़े प्रोजेक्ट्स की धीमी रफ्तार से बढ़ी चिंता

राज्य में सड़क, पुल, बिजली, शहरी विकास और अन्य बुनियादी ढांचे से जुड़े कई बड़े प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। यदि किसी परियोजना में भुगतान, टेंडर या फंड रिलीज होने के कारण काम की गति प्रभावित होती है तो उसका असर निर्माण कार्यों पर दिखाई दे सकता है।

इसी तरह सरकारी कर्मचारियों के इंक्रीमेंट या अन्य वित्तीय लाभों में देरी भी सरकार के खर्च और बजट प्रबंधन को लेकर सवाल खड़े कर सकती है। लेकिन किसी योजना या प्रोजेक्ट की गति धीमी होने के पीछे प्रशासनिक और तकनीकी कारण भी हो सकते हैं।

क्या वाकई आर्थिक संकट में है बिहार सरकार?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन घटनाओं को बिहार सरकार के आर्थिक संकट में होने का संकेत माना जाए। उपलब्ध हालिया जानकारी के आधार पर ऐसा निष्कर्ष सीधे निकालना उचित नहीं होगा। राज्य की वित्तीय स्थिति समझने के लिए राजस्व प्राप्ति, राजकोषीय घाटा, कर्ज, ब्याज भुगतान और बजट खर्च जैसे कई आंकड़ों का एक साथ विश्लेषण करना जरूरी है।

फिलहाल इतना जरूर है कि वेतन-पेंशन भुगतान, योजनाओं की किस्तों और बड़े प्रोजेक्ट्स के खर्च को लेकर उठ रहे सवालों ने सरकार की वित्तीय प्रबंधन क्षमता पर चर्चा तेज कर दी है। आने वाले महीनों में राजस्व संग्रह और सरकारी खर्च की स्थिति यह स्पष्ट करेगी कि यह केवल अस्थायी नकदी प्रबंधन की चुनौती है या राज्य के वित्त पर दबाव वास्तव में बढ़ रहा है।