पत्नी को दूसरे पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखना अवैध संबंध का सबूत नहीं, फुटेज में देखें पटना हाईकोर्ट ने खारिज की तलाक की अर्जी
पटना हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल पत्नी को किसी अन्य पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लेना, उसके अवैध संबंधों का ठोस सबूत नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘आपत्तिजनक पोजिशन’ और ‘शारीरिक संबंध बनाना’ दोनों अलग-अलग बातें हैं। पति की ओर से शारीरिक संबंध का ठोस प्रमाण पेश नहीं किए जाने पर हाईकोर्ट ने तलाक की अर्जी खारिज कर दी।
यह फैसला 3 सितंबर 2026 को जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की पीठ ने सुनाया। मामला समस्तीपुर के रहने वाले एक युवक से जुड़ा है, जिसकी शादी मधुबनी की युवती से 2 जुलाई 2006 को हुई थी। शादी के बाद पति ने पत्नी पर अपनी बड़ी बहन के पति यानी जीजा के साथ अवैध संबंध होने का आरोप लगाया था।
पति की ओर से अदालत में दावा किया गया कि उसने एक बार अपनी पत्नी और जीजा को आपत्तिजनक स्थिति में देखा था। जब उसने इस बारे में पत्नी से विरोध जताया तो वह नाराज हो गई और बाद में उसके साथ क्रूर व्यवहार करने लगी। इन्हीं आरोपों के आधार पर पति ने तलाक की मांग की थी।
वहीं, पत्नी ने पति के सभी आरोपों को खारिज कर दिया। उसने अदालत में कहा कि जीजा के साथ अवैध संबंध का आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत है। पत्नी के मुताबिक, इस तरह का आरोप लगाना अपने आप में मानसिक क्रूरता के समान है। उसने अवैध संबंध होने से साफ इनकार किया और पति की ओर से लगाए गए आरोपों को गलत बताया।
मामले की सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को आपत्तिजनक स्थिति में देखना और उसके शारीरिक संबंध में शामिल होने के बीच अंतर है। अदालत ने माना कि केवल संदेह या किसी परिस्थिति को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दोनों के बीच यौन संबंध भी बने थे।
पीठ ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता पति अपनी पत्नी और दूसरे पुरुष के बीच शारीरिक संबंध होने का कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया। ऐसे में केवल आपत्तिजनक स्थिति में देखे जाने के आधार पर अवैध संबंध का आरोप साबित नहीं होता। अदालत ने इसी आधार पर तलाक की याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को वैवाहिक विवादों में सबूत की अहमियत से जोड़कर देखा जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि गंभीर आरोप लगाने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय प्रमाण जरूरी हैं। केवल शक, आरोप या किसी संदिग्ध परिस्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र या वैवाहिक संबंधों को लेकर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि तलाक के मामलों में मानसिक क्रूरता और व्यभिचार जैसे आरोपों को साबित करने के लिए अदालत ठोस साक्ष्यों पर जोर देती है। पटना हाईकोर्ट ने पति की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में शारीरिक संबंध का प्रमाण उपलब्ध नहीं है।