10 साल बाद बदलेगा आरक्षण रोस्टर, जाति जनगणना से बदलेंगे पंचायत चुनाव के समीकरण
बिहार में आगामी पंचायत चुनाव को लेकर आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। करीब 10 साल बाद पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण रोस्टर नए सिरे से तैयार किया जाएगा। जाति आधारित गणना के आंकड़ों के आधार पर पंचायतों में विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण होने की संभावना है। इससे गांव की राजनीति और पंचायत चुनाव के समीकरण बड़े स्तर पर बदल सकते हैं।
नई व्यवस्था का सबसे बड़ा असर मुखिया पद की सीटों पर पड़ने की संभावना है। वर्तमान में जहां करीब 8 हजार मुखिया सीटों का आरक्षण रोस्टर लागू है, वहीं नई गणना और परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़कर करीब 13 हजार तक पहुंचने की बात कही जा रही है। हालांकि अंतिम संख्या और आरक्षण का स्वरूप सरकारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
जातीय आंकड़ों के आधार पर होगा बदलाव
पंचायत चुनाव में आरक्षण का निर्धारण अलग-अलग वर्गों की आबादी और निर्धारित संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर किया जाता है। बिहार में जाति आधारित सर्वेक्षण के आंकड़े सामने आने के बाद इन आंकड़ों का इस्तेमाल पंचायत स्तर पर आरक्षण की गणना में किए जाने की संभावना है।
इससे पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों के आंकड़ों में बदलाव हो सकता है। महिलाओं के लिए आरक्षण का भी नए रोस्टर के अनुसार निर्धारण किया जाएगा।
कई पंचायतों में बदल सकती है सीट
आरक्षण रोस्टर बदलने का सीधा असर मौजूदा जनप्रतिनिधियों और चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों पर पड़ेगा। जिन पंचायतों में पिछले चुनाव में कोई विशेष सीट सामान्य या आरक्षित वर्ग के लिए थी, नई व्यवस्था में उसका वर्ग बदल सकता है।
इसका मतलब है कि कई मौजूदा मुखिया, पंचायत समिति सदस्य और अन्य प्रतिनिधि अगला चुनाव उसी सीट से नहीं लड़ पाएंगे। वहीं आरक्षण बदलने से नए उम्मीदवारों के लिए भी चुनावी मैदान खुल सकता है।
महिला आरक्षण से भी बदलेंगे समीकरण
पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षण पहले से लागू है। नए रोस्टर में महिलाओं के आरक्षण का निर्धारण भी नए सिरे से किया जाएगा। ऐसे में कई पंचायतों में मुखिया और अन्य पद महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हो सकते हैं।
इस बदलाव के कारण गांवों में संभावित उम्मीदवार अभी से अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुट सकते हैं। राजनीतिक दलों और स्थानीय संगठनों की सक्रियता भी बढ़ने की संभावना है।
10 साल बाद क्यों जरूरी हुआ नया रोस्टर
पंचायत चुनाव में आरक्षण का रोस्टर लंबे समय से लागू व्यवस्था के आधार पर चल रहा था। अब नई जनसंख्या और जातीय आंकड़ों के आधार पर आरक्षण की समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही है। नए आंकड़ों के आधार पर सीटों का वर्गीकरण करने से आरक्षण व्यवस्था को आबादी के अनुपात के अनुरूप बनाने का प्रयास किया जाएगा।
हालांकि नए आरक्षण रोस्टर को अंतिम रूप देने से पहले सरकार और संबंधित विभागों को कई चरणों की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। पंचायतवार आंकड़ों का अध्ययन, सीटों का निर्धारण और आपत्तियों के निपटारे के बाद अंतिम सूची जारी की जाएगी।
चुनावी राजनीति पर पड़ेगा असर
नया आरक्षण रोस्टर लागू होने के बाद बिहार के पंचायत चुनाव की राजनीति में बड़े बदलाव की संभावना है। जिन क्षेत्रों में सीट का आरक्षण बदलेगा, वहां वर्षों से चुनाव लड़ रहे नेताओं को नई रणनीति बनानी पड़ेगी। वहीं नए सामाजिक समीकरणों के आधार पर कई नए चेहरे भी चुनावी मैदान में उतर सकते हैं।
इस तरह जाति जनगणना के आंकड़े केवल आरक्षण व्यवस्था को ही प्रभावित नहीं करेंगे, बल्कि पंचायत स्तर पर नेतृत्व और चुनावी समीकरणों को भी बदल सकते हैं। अब सभी की नजर नए आरक्षण रोस्टर की आधिकारिक घोषणा पर है।