मुजफ्फरपुर में महज 225 रुपये के विवाद का मामला 33 साल बाद सुलझा
जिले से न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार को उजागर करने वाला एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। महज 225 रुपये की छिनतई और मारपीट के एक मामूली विवाद का मामला अदालत के चक्कर में पूरा 33 साल तक लंबित रहा।
यह मामला वर्ष 1992 में दर्ज किया गया था और तब से लेकर अब तक विभिन्न अदालतों में पेश होता रहा। इतने लंबे समय तक न्याय न मिल पाने के कारण यह मामला जिले में न्यायिक प्रक्रियाओं में देरी और कामकाज की अक्षमता का प्रतीक बन गया।
आखिरकार सोमवार को एसीजेएम-प्रथम पश्चिमी की अदालत ने इस लंबे समय से लंबित मामले पर अंतिम फैसला सुनाया। अधिकारियों ने बताया कि इस फैसले के साथ तीन दशकों से अधिक समय तक लंबित रहने वाले मामले का अंत हुआ, लेकिन इस अवधि में कितने पीड़ित और आरोपी इस लंबी कानूनी प्रक्रिया से प्रभावित हुए, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायिक प्रणाली में इस तरह की अत्यधिक देरी न केवल नागरिकों का विश्वास कमजोर करती है, बल्कि छोटे मामलों में भी सुरक्षा और राहत देने में असमर्थ साबित होती है। उन्होंने सुझाव दिया कि अदालतों में न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने और लंबित मामलों की प्राथमिकता तय करने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
वकीलों का कहना है कि महज 225 रुपये की रकम के लिए इतने वर्षों तक अदालतों में झूलते रहने से यह स्पष्ट होता है कि न्याय की पहुँच आम नागरिकों के लिए कितनी धीमी और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। उन्होंने सरकार और न्यायिक विभाग से अपील की कि लंबित मामलों के निपटारे के लिए विशेष पहल की जाए।
इस घटना ने मुजफ्फरपुर में नागरिकों और विशेषज्ञों के बीच न्यायिक सुधारों की मांग को और जोरदार बना दिया है। ऐसे मामले दर्शाते हैं कि न्याय मिलने में देरी केवल पीड़ितों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।
अंततः यह मामला यह संदेश देता है कि न्याय की प्रक्रिया में तेजी लाना और समान्य नागरिकों के लिए न्याय सुलभ बनाना अत्यंत आवश्यक है।