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ग्रेटर नोएडा हादसे ने खोली शहरी सुरक्षा की पोल, पटना में खुले मैनहोल और गड्ढे बन रहे जानलेवा खतरा

 

ग्रेटर नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की निर्माणाधीन गड्ढे में डूबने से हुई दर्दनाक मौत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह हादसा सिर्फ एक व्यक्ति की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के तेजी से विकसित हो रहे शहरों में बुनियादी ढांचे की खामियों और लापरवाह शहरी प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। खासतौर पर पटना जैसे शहरों में यह घटना एक चेतावनी के तौर पर देखी जा रही है, जहां खुले मैनहोल, अधूरे निर्माण कार्य और असुरक्षित गड्ढे रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।

ग्रेटर नोएडा हादसे में सामने आया कि निर्माणाधीन साइट पर न तो पर्याप्त बैरिकेडिंग थी और न ही चेतावनी संकेत लगाए गए थे। यही लापरवाही युवराज मेहता की जान ले बैठी। शहरी विकास के नाम पर चल रहे ऐसे असुरक्षित निर्माण कार्य अब आम लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या सिर्फ ग्रेटर नोएडा तक सीमित नहीं है, बल्कि पटना, दिल्ली, मुंबई जैसे कई शहरों में यही हालात हैं।

पटना नगर निगम (PMC) के अधिकार क्षेत्र में ही लगभग 60 हजार से 70 हजार मैनहोल मौजूद हैं। इनमें से बड़ी संख्या में मैनहोल या तो टूटे हुए हैं, खुले पड़े रहते हैं या फिर बारिश के दौरान पानी से भर जाते हैं, जिससे उनकी पहचान तक मुश्किल हो जाती है। हर साल मानसून के मौसम में खुले मैनहोल और गड्ढों में गिरने की घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें कई बार लोगों की जान तक चली जाती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क निर्माण, सीवरेज और ड्रेनेज के नाम पर जगह-जगह गड्ढे खोद दिए जाते हैं, लेकिन काम पूरा होने के बाद भी उन्हें ठीक से ढंका नहीं जाता। कई जगहों पर अस्थायी ढक्कन लगाए जाते हैं, जो हल्की सी चूक में हट जाते हैं। रात के समय और बारिश के दौरान ये गड्ढे मौत का फंदा बन जाते हैं।

नगर निगम की ओर से समय-समय पर दावे किए जाते हैं कि खुले मैनहोल को ढंका जा रहा है और निर्माण एजेंसियों को सुरक्षा मानकों का पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट नजर आती है। पटना के कई इलाकों में खुले मैनहोल और अधूरे निर्माण कार्य आम दृश्य बन चुके हैं।