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बिहार में कमाई धीमी, कर्ज बढ़ा: CAG और ICSSR के मंथन में सामने आई वित्तीय तस्वीर

 

बिहार की आर्थिक और वित्तीय स्थिति को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी ICSSR की पहल के तहत महत्वपूर्ण चर्चा सामने आई है। इस मंथन में राज्य की आय, सरकारी खर्च, सार्वजनिक कर्ज और वित्तीय प्रबंधन जैसे मुद्दों पर उपलब्ध आंकड़ों और ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर अध्ययन करने पर जोर दिया गया। CAG और ICSSR ने सार्वजनिक वित्त और वित्तीय प्रशासन से जुड़े विषयों पर शोध को बढ़ावा देने के लिए देशभर में संयुक्त शोध प्रतियोगिता शुरू की है।

इस पहल के तहत राज्यों की वित्तीय स्थिति से जुड़े आंकड़ों को शोध और विश्लेषण के लिए सामने रखा गया है। CAG ने वित्त वर्ष 2013-14 से 2022-23 तक के 28 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के सार्वजनिक वित्त का दशकीय अध्ययन तैयार किया है। इसमें राज्यों की आय, खर्च, सार्वजनिक कर्ज, देनदारियां, राजकोषीय घाटा और सरकारी गारंटी जैसे महत्वपूर्ण वित्तीय संकेतकों को शामिल किया गया है।

आय बढ़ने की रफ्तार पर सवाल

बिहार के संदर्भ में सामने आई चर्चा का एक अहम पहलू राज्य की कमाई और उसके खर्च के बीच संतुलन है। सरकार की अपनी आय के स्रोत सीमित होने की स्थिति में विकास योजनाओं और जरूरी सरकारी खर्च को पूरा करने के लिए बाहरी संसाधनों पर निर्भरता बढ़ सकती है। यही वजह है कि राजस्व संग्रह की गति और राज्य की वित्तीय क्षमता को मजबूत करना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि, सेवा क्षेत्र और छोटे कारोबार की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में रोजगार और आय के अवसर बढ़ाने के साथ-साथ राज्य के अपने कर राजस्व को मजबूत करना भी जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय में वित्तीय मजबूती के लिए केवल खर्च बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऐसे क्षेत्रों में निवेश करना होगा, जिससे सरकार की आय और लोगों की कमाई दोनों बढ़ें।

बढ़ता कर्ज बना चिंता का विषय

बिहार की वित्तीय स्थिति पर चर्चा में सार्वजनिक कर्ज और देनदारियां भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। जब सरकार की आय की तुलना में खर्च अधिक होता है तो बजट की जरूरतें पूरी करने के लिए उधार का सहारा लिया जाता है। कर्ज से विकास कार्यों के लिए संसाधन जुटाए जा सकते हैं, लेकिन लगातार बढ़ती देनदारियां भविष्य के बजट पर दबाव डाल सकती हैं।

इसीलिए वित्तीय प्रबंधन में यह देखना जरूरी है कि लिया गया कर्ज किस तरह की परियोजनाओं में इस्तेमाल हो रहा है और उससे भविष्य में कितनी आर्थिक गतिविधि पैदा होगी। उत्पादक क्षेत्रों में निवेश से रोजगार और राजस्व दोनों बढ़ सकते हैं, जबकि गैर-उत्पादक खर्च बढ़ने पर कर्ज का बोझ चुनौती बन सकता है।

CAG-ICSSR की पहल क्यों अहम

CAG और ICSSR की संयुक्त पहल का उद्देश्य केवल आंकड़ों को सामने रखना नहीं, बल्कि युवाओं और शोधकर्ताओं को सरकारी वित्तीय आंकड़ों और ऑडिट रिपोर्ट का विश्लेषण करने के लिए प्रोत्साहित करना भी है। इस कार्यक्रम में वित्तीय संघवाद और शासन, सामाजिक क्षेत्र पर खर्च, कौशल एवं रोजगार, MSME तथा ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने जैसे विषय शामिल किए गए हैं।

इस पहल से बिहार जैसे राज्यों की वित्तीय स्थिति पर तथ्य आधारित अध्ययन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। आय की धीमी वृद्धि और बढ़ते कर्ज के बीच राज्य के लिए राजस्व बढ़ाना, खर्च की गुणवत्ता सुधारना और कर्ज का बेहतर प्रबंधन करना आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण चुनौती रहेगी। विशेषज्ञों के लिए यह भी अहम होगा कि विकास योजनाओं पर होने वाले खर्च का वास्तविक असर रोजगार, प्रति व्यक्ति आय और राज्य की आर्थिक क्षमता पर कितना पड़ता है।