मधुबनी की अनीता झा, 13 साल से कार की पिछली सीट बना चैंबर, जज्बे से रच रहीं वकालत की नई मिसाल
बिहार के मधुबनी जिले से एक ऐसी अनोखी और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जो न सिर्फ कानून के पेशे से जुड़े लोगों को बल्कि समाज के हर वर्ग को सोचने पर मजबूर करती है। यहां की वकील अनीता झा पिछले 13 वर्षों से अपनी कार की पिछली सीट को ही अपना चैंबर बनाकर वकालत की प्रैक्टिस कर रही हैं। कोर्ट परिसर में जहां आमतौर पर बड़े-बड़े चैंबर और दफ्तर नजर आते हैं, वहीं अनीता झा ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने हौसले और मेहनत से एक अलग पहचान बनाई है।
अनीता झा ने अपनी कार को पूरी तरह वकालत के काम के अनुरूप ढाल लिया है। कार की पिछली सीट पर बैठकर ही वे अपने क्लाइंट्स से मुलाकात करती हैं, केस की फाइलें देखती हैं और जरूरी कानूनी सलाह देती हैं। उनका कहना है कि चैंबर न होने के बावजूद उनके काम में कभी कमी नहीं आई, बल्कि यह व्यवस्था उन्हें स्वतंत्रता और सुविधा दोनों देती है।
अनीता झा बताती हैं कि वकालत की शुरुआत के समय उनके पास स्थायी चैंबर किराए पर लेने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे। कोर्ट परिसर में चैंबर मिलना भी आसान नहीं था। ऐसे में उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी कार को ही अपना अस्थायी कार्यालय बना लिया। समय बीतता गया और यह अस्थायी व्यवस्था ही उनकी पहचान बन गई।
उनके क्लाइंट्स भी इस अनोखे चैंबर से पूरी तरह संतुष्ट हैं। कई लोग कहते हैं कि अनीता झा की वकालत उनकी सीट या चैंबर से नहीं, बल्कि उनके ज्ञान और समर्पण से पहचानी जाती है। कार में बैठकर भी वे पूरी गंभीरता और पेशेवर तरीके से मामलों को संभालती हैं।
अनीता झा का मानना है कि वकालत सिर्फ संसाधनों का खेल नहीं है, बल्कि संघर्ष, निरंतरता और ईमानदारी का पेशा है। वे कहती हैं, “अगर इरादा मजबूत हो, तो जगह मायने नहीं रखती। मेरे लिए मेरी कार ही मेरा ऑफिस है और यही मेरी पहचान बन गई है।”
कोर्ट परिसर में अनीता झा की यह अलग शैली अब चर्चा का विषय बन चुकी है। कई युवा वकील उनसे प्रेरणा लेते हैं और मानते हैं कि शुरुआती कठिनाइयों के बावजूद अपने लक्ष्य पर टिके रहना ही सफलता की कुंजी है।
महिला सशक्तिकरण के नजरिए से भी अनीता झा की कहानी बेहद खास है। एक महिला वकील के तौर पर उन्होंने तमाम सामाजिक और पेशेवर चुनौतियों का सामना किया, लेकिन कभी अपने आत्मविश्वास को कमजोर नहीं पड़ने दिया।
आज अनीता झा मधुबनी में एक जानी-मानी वकील के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि सफलता के लिए आलीशान दफ्तर नहीं, बल्कि मजबूत इरादे और मेहनत की जरूरत होती है। कार की पिछली सीट से शुरू हुआ उनका सफर अब हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है।