इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 23 साल जेल काटने के बाद आरोपी को पत्नी और 3 बच्चों की हत्या के मामले में बरी किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक शख्स को 23 साल जेल में रहने के बाद अपनी पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के मामले में बरी कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी की गलती साबित नहीं कर सका।
इस फैसले की घोषणा जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की दो जजों की बेंच ने 16 फरवरी को की। हाईकोर्ट ने इस मामले को हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था पर एक दुखद टिप्पणी बताया और कहा कि ऐसे मामलों पर गंभीर सोच-विचार और सुधार की आवश्यकता है।
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि इस प्रकार की गलत जेल और लंबी सुनवाई केवल आरोपी के जीवन को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि समाज और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लगाती है।
बेंच ने आगे कहा कि वास्तविक सुधार के उपाय जैसे न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना, उनके सहायक स्टाफ की तादाद बढ़ाना और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करना इस समय अत्यंत आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ सम्मेलन और बैठकें करने से स्थिति में सुधार नहीं होगा, बल्कि ठोस और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला न्याय व्यवस्था की कमियों और लंबी सुनवाई के खतरों को उजागर करता है। उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों में न केवल आरोपी और उसके परिवार को मानसिक और आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि सच्चाई उजागर होने में वर्षों लग जाते हैं, जिससे न्याय का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है।
कोर्ट के फैसले के बाद आरोपी की आजादी और सम्मान बहाल हुआ, लेकिन यह भी सवाल उठता है कि इतने लंबे समय तक अनावश्यक कैद क्यों हुई। न्यायविदों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं यह दिखाती हैं कि जिला और सत्र अदालतों में मामलों की लंबी सुनवाई, अधूरी जांच और स्टाफ की कमी किस तरह दोषपूर्ण निर्णयों को जन्म देती है।
इस फैसले के प्रकाश में अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि संसाधनों और मानव शक्ति को बढ़ाकर न्याय प्रणाली को और मजबूत किया जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर न्यायाधीशों की संख्या, सहायक स्टाफ और तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार नहीं किया गया, तो ऐसी घटनाएं भविष्य में भी दोहराई जा सकती हैं।
कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि न्याय प्रणाली के सभी हितधारकों—अधिकारियों, वकीलों और नीति निर्माताओं—को मिलकर सुनियोजित सुधार और संसाधन वृद्धि पर काम करना चाहिए।
कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 23 साल जेल में रहने के बाद आरोपी को बरी करके न केवल उसके जीवन को बहाल किया, बल्कि न्याय व्यवस्था की कमियों पर भी जोरदार टिप्पणी की। यह फैसला यह याद दिलाता है कि सक्षम न्याय, संसाधनों और सही प्रबंधन के बिना अधूरी ही रह सकती है, और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाना समय की जरूरत है।