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बांकीपुर जीत के बाद बोले प्रशांत किशोर, '3 साल की मेहनत पर जनता ने लगाई मुहर, जाति-धर्म से ऊपर उठकर दिया वोट'

 

बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज करने के बाद जनसुराज के संस्थापक और नवनिर्वाचित विधायक प्रशांत किशोर ने जनता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह जीत उनकी तीन वर्षों की लगातार मेहनत और ईमानदार प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि बांकीपुर की जनता ने पारंपरिक राजनीति से अलग एक नए विकल्प पर भरोसा जताया और जाति-धर्म से ऊपर उठकर मतदान किया।

'तीन साल की मेहनत का मिला परिणाम'

प्रशांत किशोर ने कहा कि पिछले तीन वर्षों से वह लगातार लोगों के बीच रहे और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास किया। उन्होंने कहा, "लोगों ने तीन साल के मेरे ईमानदार प्रयास को देखा, इसलिए मुझे एक विकल्प के रूप में स्वीकार किया।"

उनके मुताबिक, यह जीत केवल एक उम्मीदवार की नहीं, बल्कि बदलाव की राजनीति और जनसुराज की विचारधारा की जीत है।

'जाति-धर्म से ऊपर उठकर मिला समर्थन'

प्रशांत किशोर ने कहा कि बांकीपुर के मतदाताओं ने इस चुनाव में जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर मतदान किया। उन्होंने दावा किया कि लोगों ने विकास, ईमानदारी और बेहतर विकल्प को प्राथमिकता दी, जिससे उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिला।

उन्होंने कहा कि यह परिणाम इस बात का संकेत है कि बिहार की जनता अब नई राजनीति और जवाबदेह नेतृत्व चाहती है।

जनता का जताया आभार

नवनिर्वाचित विधायक ने चुनाव में समर्थन देने वाले सभी मतदाताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि जनता ने उन पर जो विश्वास जताया है, उस पर खरा उतरना उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।

उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे बांकीपुर के विकास, बुनियादी सुविधाओं में सुधार और जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता के साथ उठाएंगे।

बिहार की राजनीति में बढ़ी जनसुराज की चर्चा

बांकीपुर उपचुनाव में मिली जीत के बाद जनसुराज की राजनीतिक मौजूदगी को नई मजबूती मिली है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस जीत से बिहार की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं और आने वाले चुनावों में जनसुराज की भूमिका पर भी सबकी नजर रहेगी।

प्रशांत किशोर के इस बयान ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वह अपनी जीत को केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि जनता के भरोसे और बदलाव की इच्छा का समर्थन मानते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वह अपने चुनावी वादों को किस तरह जमीन पर उतारते हैं।