आज भी किसी शुभ कार्य या पूजा में क्यों इस्तेमाल नहीं होता चम्बल नदी का जल, वीडियो में महाभारत कालीन कथा जान उड़ जाएंगे होश
भारत में नदियों को मां का दर्जा दिया गया है। गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी से लेकर नर्मदा तक हर नदी का अपना आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। लेकिन इसी भारत में एक ऐसी नदी भी है जिसका जल आज तक किसी शुभ कार्य में इस्तेमाल नहीं किया गया- चंबल नदी। आपने अक्सर देखा होगा कि पूजा-पाठ, यज्ञ, विवाह या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में गंगा जल का विशेष स्थान होता है। लेकिन क्या आपके मन में कभी ये सवाल आया है कि चंबल नदी का पानी क्यों नहीं लाया जाता? चंबल के पानी से किसी मूर्ति का अभिषेक क्यों नहीं किया जाता? इसका जवाब सिर्फ प्रचलित मान्यता नहीं, बल्कि एक हृदय विदारक पौराणिक कथा में छिपा है- जो हमें महाभारत काल में ले जाती है।
द्रौपदी का श्राप बना चंबल की 'अपवित्रता' का कारण
चंबल नदी का नाम सुनते ही डाकुओं की धरती, बीहड़ों की वीरानी और अपराध का इतिहास याद आ जाता है। लेकिन इसका जुड़ाव सिर्फ भौगोलिक और ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि गहरा पौराणिक भी है। महाभारत के अनुसार, जब कौरवों ने द्रौपदी का चीरहरण किया और दरबार में मौजूद किसी भी योद्धा ने विरोध नहीं किया, तो द्रौपदी ने आसमान की ओर देखते हुए गुस्से में कसम खाई कि, “जिस भूमि पर मेरा सम्मान छीना गया, वहां से कुछ भी - पानी, भोजन या फूल - कभी भी शुभ नहीं माना जाएगा।” ऐसा माना जाता है कि द्रौपदी का विलाप और गुस्सा चंबल नदी में गूंजा था, जहां दरबार लगा हुआ था। चूंकि उस समय की घटनाएं हस्तिनापुर के पास और चंबल क्षेत्र से संबंधित थीं, इसलिए लोगों का मानना था कि द्रौपदी के श्राप ने इस नदी को 'अपवित्र' बना दिया है।
चंबल का पानी - दिखने में साफ, लेकिन आध्यात्मिक रूप से 'वर्जित'
चंबल नदी मध्य प्रदेश की मालवा पहाड़ियों से निकलती है और उत्तर प्रदेश और राजस्थान से होकर यमुना में मिलती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, इस नदी का पानी कई बार अन्य नदियों की तुलना में शुद्ध और प्रदूषण मुक्त पाया गया है। फिर भी, इसका पानी कभी भी पूजा के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता है। गाँवों, कस्बों और शहरों में लोग आज भी इस मान्यता का पालन करते हैं। अगर किसी के घर में कोई यज्ञ या हवन चल रहा हो - तो चंबल नदी से पानी लाना अशुभ माना जाता है। अगर गंगा जल की कमी हो तो लोग नर्मदा या यमुना का रुख करते हैं, लेकिन चंबल का नहीं।
लोकप्रिय मान्यता या आस्था का असर?
कई लोग तर्क देते हैं कि यह केवल एक लोकप्रिय मान्यता है, कोई दृढ़ धार्मिक वर्जना नहीं। लेकिन भारत जैसे देश में, जहाँ आस्था का असर किसी भी नियम से ज़्यादा मजबूत होता है, ऐसी मान्यताएँ पीढ़ी दर पीढ़ी चली आती हैं। कुछ पंडितों और पुजारियों से बात करने पर यही जानकारी मिलती है कि चंबल के पानी का इस्तेमाल कभी-कभी "तांत्रिक अनुष्ठानों" में किया जाता है, लेकिन वैदिक, धार्मिक या शुभ आयोजनों से इसका नाम हटा दिया गया है। और इसका मुख्य कारण द्रौपदी का श्राप माना जाता है।
चंबल का रहस्य और वायरल वीडियो
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें चंबल नदी के किनारे खड़े एक स्थानीय व्यक्ति ने इस रहस्य को साझा किया। वीडियो में वह बता रहा है कि कैसे बुजुर्गों से सुनी कहानियाँ आज भी लोगों की आस्था में ज़िंदा हैं। वीडियो में महाभारत काल की कहानियों, द्रौपदी के रोने और चीरहरण की पीड़ा का जिक्र होते ही हजारों लोगों ने कमेंट करना शुरू कर दिया- किसी ने इसे "चमत्कार" कहा तो किसी ने इसे "दुखद सत्य" कहा।
निष्कर्ष: आस्था और विज्ञान के बीच चंबल की कहानी
आज के आधुनिक युग में जहां विज्ञान हर विषय को समझाता है, वहीं चंबल जैसी नदियां उस जगह पर खड़ी हैं जहां विज्ञान चुप हो जाता है और आस्था बोलती है। चंबल नदी का पानी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भले ही स्वच्छ हो, लेकिन इसकी आत्मा आज भी एक अनसुने अभिशाप से बोझिल है। जब भी कोई इसे समझने की कोशिश करता है, तो महाभारत की गूंज सुनाई देती है। तो अगली बार जब आप किसी शुभ अवसर पर गंगाजल लेने जाएं और कोई कहे "चंबल से ही लाओ", तो एक पल रुकें... और उस कहानी को याद करें, जो पीढ़ियों से आस्था का हिस्सा रही है।