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आखिर कब और किसने बनवाया रणथम्भौर का ऐतिहासिक त्रिनेत्र गणेश मंदिर, वीडियो में जाने चमत्कारी मंदिर का पूरा इतिहास 

 

भारत को पूरी दुनिया में त्यौहारों के देश के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी उनमें से एक है, जहां इस खास अवसर पर प्रथम पूज्य गजानंद भगवान की पूजा बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। कुछ लोग अपने घरों में गणेश जी की मूर्ति स्थापित करते हैं, तो कई लोग इस दौरान मंदिरों में गणपति की पूजा करते हैं। इस साल गणेश चतुर्थी देश में 25 अगस्त को मनाई जाएगी। इसलिए गणेश चतुर्थी को लेकर प्रदेश भर में तैयारियां जोरों पर चल रही हैं। ऐसे में आज हम आपको सवाई माधोपुर जिले में स्थित विश्व धरोहर रणथंभौर किले के अंदर त्रिनेत्र गणेश मंदिर की स्थापना और इससे जुड़े इतिहास से रूबरू करा रहे हैं। आस्था और चमत्कार का अनूठा संगम माना जाने वाला यह मंदिर जिला मुख्यालय से 13 किलोमीटर दूर स्थित है।

<a href=https://youtube.com/embed/w-rFaeiFsEU?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/w-rFaeiFsEU/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden"" title="Moti Dungri Ganesh Temple Jaipur | मोती डूंगरी मंदिर का इतिहास, कथा, मान्यता, चमत्कार और लाइव दर्शन" width="1250">

रणथंभौर किले के अंदर स्थापित भगवान गणेश का यह ऐतिहासिक मंदिर न सिर्फ राजस्थान वासियों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि देशभर में त्रिनेत्र गणेश मंदिर की अपनी अलग पहचान है। आस्था और चमत्कार की कहानियों से भरा भगवान गणेश का यह मंदिर जितना प्राचीन है, उतना ही विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी है। रणथंभौर किले से होकर इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को करीब 1579 फीट की ऊंचाई पार करनी पड़ती है।

भक्तों की भीड़ के कारण रणथंभौर की अरावली और विंध्याचल की पहाड़ियां गजानन के जयकारों से गूंजती रहती हैं। इस प्राचीन मंदिर से जुड़ी कई ऐतिहासिक और धार्मिक कहानियां भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण महाराजा हमीरदेव चौहान ने करवाया था और उन्होंने इसे स्वप्न देखकर बनवाया था। दरअसल, रणथंभौर में महाराजा हमीरदेव और अलाउद्दीन खिलजी के बीच 1299-1301 के बीच युद्ध हुआ था, उस समय दिल्ली के शासक अलाउद्दीन खिलजी के सैनिकों ने इस किले को चारों तरफ से घेर लिया था। तो समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी, ऐसे में भगवान गणेश ने एक महाराजा को स्वप्न में कहा कि अगर वह मेरी पूजा करेंगे तो सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी। अगले ही दिन किले की दीवार पर त्रिनेत्र गणेश की मूर्ति अंकित हो गई। और उसके बाद हमीरदेव ने भगवान गणेश द्वारा बताए गए स्थान पर मंदिर बनवाया। कई वर्षों से चल रहा युद्ध भी समाप्त हो गया।

मान्यता है कि पूरी दुनिया में सिर्फ इसी त्रिनेत्र गणेश मंदिर में भगवान गणपति देव अपने पूरे परिवार, अपनी दोनों पत्नियों रिद्धि और सिद्धि के साथ ही पुत्र शुभ और लाभ के साथ विराजमान हैं। इतना ही नहीं, पूरे भारत में प्रथम पूज्य गणेश के चार स्वयंभू मंदिर हैं, जिनमें रणथंभौर का त्रिनेत्र गणेश मंदिर प्रथम स्थान माना जाता है। मान्यता है कि महाराजा विक्रमादित्य हर बुधवार को उज्जैन से यहां आकर मंदिर में पूजा-अर्चना करते थे। जयपुर से इस प्राचीन मंदिर की दूरी करीब 142 किलोमीटर है।

किंवदंतियों के अनुसार भगवान राम ने जिस स्वयंभू मूर्ति की पूजा की थी, उसे हमीरदेव ने यहां प्रकट किया था और गणेशजी का मंदिर बनवाया था। इस मंदिर में भगवान गणेश त्रिनेत्र रूप में विराजमान हैं, जिसमें तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान गणेश अपने पूरे परिवार, दो पत्नियों- ऋद्धि और सिद्धि और दो पुत्रों- शुभ और लाभ के साथ विराजमान हैं। भारत में चार स्वयंभू गणेश मंदिर हैं, जिनमें रणथंभौर का त्रिनेत्र गणेश मंदिर प्रथम माना जाता है। कहा जाता है कि यहां लाखों भक्त त्रिनेत्र गणेश के दर्शन के लिए आते हैं। और जो भी यहां सच्ची आस्था से त्रिनेत्र गणेश की पूजा करता है भगवान उसकी मनोकामना जरूर पूरी करते हैं।

साथ ही उसे ज्ञान, सौभाग्य और समृद्धि का आशीर्वाद भी देते हैं। सबसे खास बात यह है कि शादी के दिनों में यहां त्रिनेत्र गणेश के नाम से हजारों की संख्या में शादी के निमंत्रण पत्र आते हैं। किंवदंतियों के अनुसार कहा जाता है कि जब भगवान राम लंका की ओर चढ़ाई कर रहे थे तो उन्होंने इसी त्रिनेत्र गणेश का अभिषेक पूजन किया था। जिसके बाद त्रेता युग में भगवान गणेश की यह मूर्ति रणथंभौर में स्वयंभू रूप में स्थापित हुई और उसके बाद लुप्त हो गई।