कालसर्प दोष और अकाल मृत्यु से बचाता है महाकाल का ये दिव्य मंत्र, वीडियो में जाने क्यों शिव भक्तों के लिए है विशेष वरदान ?
भारतीय सनातन संस्कृति में भगवान शिव को संहारक ही नहीं, बल्कि कल्याणकारी देव भी माना गया है। उनके पंचाक्षर मंत्र — "ॐ नमः शिवाय" — को इतना शक्तिशाली माना गया है कि यह न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि कुंडली में स्थित ग्रह दोषों से भी मुक्ति दिला सकता है। खासकर काल सर्प दोष और अकाल मृत्यु जैसे भयावह योगों से बचाने में इस मंत्र की अहम भूमिका मानी जाती है।
शिव पंचाक्षर मंत्र क्या है?
‘ॐ नमः शिवाय’ को पंचाक्षर मंत्र कहा जाता है, क्योंकि इसमें पाँच मुख्य अक्षर होते हैं — न, म, शि, वा, य। इन पाँच अक्षरों के साथ जब ओंकार ‘ॐ’ जुड़ता है, तो यह महामंत्र बन जाता है। इस मंत्र का अर्थ होता है — "मैं शिव को नमन करता हूँ"। लेकिन इसका भावार्थ और भी गहरा है: यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सेतु है।
काल सर्प दोष क्या है और कैसे प्रभाव डालता है?
काल सर्प दोष तब बनता है जब किसी व्यक्ति की कुंडली में सभी ग्रह राहु और केतु के बीच आ जाते हैं। यह दोष व्यक्ति के जीवन में बाधाएं, मानसिक तनाव, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, असफलताएं और कई बार अकाल मृत्यु तक का योग बना सकता है। यह दोष न केवल कर्मों का फल दर्शाता है, बल्कि पूर्वजों के अधूरे कार्यों और उनके ऋण से भी जुड़ा होता है।
अकाल मृत्यु से सुरक्षा का कवच
शास्त्रों में कहा गया है कि "मृत्यु को भी वश में करने की शक्ति केवल शिव के पास है।" इसलिए जब भक्त शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करता है, तो वह मृत्यु भय से मुक्त होता है। यह मंत्र मानसिक संतुलन, आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है। यह ब्रह्मांड की पांच मूलभूत शक्तियों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — को भी संतुलित करता है, जिससे जीवन शक्ति का संचार होता है।कई अनुभवी साधकों और ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि जो व्यक्ति रोज़ाना शिव पंचाक्षर मंत्र का 108 बार जाप करता है, उसकी मृत्यु तब तक नहीं होती जब तक उसका जीवन उद्देश्य पूरा न हो जाए।
॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम: शिवाय ॥1॥
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय, नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय, तस्मै मकाराय नम: शिवाय ॥2॥
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय, तस्मै शिकाराय नम: शिवाय ॥3॥
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय, तस्मै वकाराय नम: शिवाय ॥4॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय, पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय, तस्मै यकाराय नम: शिवाय ॥5॥
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥6॥