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रुद्राष्टकम का पाठ खोलता है सौभाग्य के द्वार, शिवजी करते हैं समस्त दुःख दूर,वीडियो में जाने सही से करने का तरीका 

 

सप्ताह का हर दिन किसी न किसी देवता या ग्रह से संबंधित होता है। यहां हम बात करने जा रहे हैं सोमवार की, जिसका संबंध भोलेनाथ और चंद्रमा से है। इस दिन पूजा करने से भोलेनाथ और चंद्रमा को प्रसन्न किया जा सकता है। यहां हम आपको शिव रुद्राष्टकम पाठ के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका पाठ करने से महादेव प्रसन्न होते हैं। साथ ही इस स्तोत्र का पाठ करने से जहां आरोग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है, वहीं इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति पापों से मुक्त हो जाता है। रुद्राष्टकम गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित भगवान शिव की स्तुति है। साथ ही इसका वर्णन रामायण में भी मिलता है। आइए जानते हैं इस स्तुति के बारे में...

<a href=https://youtube.com/embed/eVeRwQyCmVA?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/eVeRwQyCmVA/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden"" title="Shree Rudraashtakam | श्री रुद्राष्टकम | Most Powerful Shiva Mantra | पंडित श्रवण कुमार शर्मा द्वारा" width="1250"> इस विधि से करें भगवान शिव की स्तुति

इस स्तुति का पाठ सोमवार से शुरू करना चाहिए। साथ ही इसके लिए सुबह जल्दी उठकर साफ कपड़े पहनें और फिर पूजा चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाएं। फिर इसके बाद शिवलिंग या भगवान शिव की तस्वीर स्थापित करें और फिर धूपबत्ती जलाएं। साथ ही भगवान शिव को सफेद चीजें अर्पित करें और फिर इस स्तुति का पाठ करें। अंत में यह प्रसाद सभी को बांटें।

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्॥
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजे हं।।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतो हं।।

तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा।।
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजे हं भवानीपतिं भावगम्यं।।
कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।


न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतो हं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो।।

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥

ओम नमः शिवाय, ओम नमः शिवाय, ओम नमः शिवाय, ओम नमः शिवाय