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मां भगवती स्तोत्र का पाठ करने से घर में आएगी सुख-शांति और समृद्धि, 2 मिनट के वायरल वीडियो में जाने पाठ विधि और सही समय 

 

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तीनों कालों के ज्ञाता महर्षि वेद व्यास ने मां दुर्गा स्तुति लिखी थी, उनकी दुर्गा स्तुति को भगवती स्तोत्र के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि महर्षि वेद व्यास ने अपनी दिव्य दृष्टि से पहले ही देख लिया था कि कलियुग में धर्म का महत्व कम हो जाएगा। इसके कारण मनुष्य नास्तिक, कर्तव्यहीन और अल्पायु वाले हो जाएंगे। इसके कारण उन्होंने वेदों को भी चार भागों में विभाजित कर दिया ताकि कम बुद्धि और कम स्मरण शक्ति वाले लोग भी वेदों का अध्ययन कर सकें। इन चार वेदों का नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद रखा गया। इसी कारण व्यासजी वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए।

<a href=https://youtube.com/embed/Db7P57Wxgjc?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/Db7P57Wxgjc/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden"" title="श्री भगवती स्तोत्रम् | जय भगवती देवी नमो वरदे | भगवती स्तोत्र | माँ भगवती स्तोत्र | दुर्गा स्तोत्र" width="853">

उन्होंने महाभारत की भी रचना की थी। भगवान कृष्ण ने मां दुर्गा की आराधना में कहा था कि आप परब्रह्म, सत्य, अनादि और शाश्वत स्वरूप हैं। आप परम ज्योति के रूप में भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए शरीर धारण करती हैं। आप सबकी स्वरूपा, सबकी देवी, सबकी आधार और पराशक्ति हैं, आप सब बीजों की स्वरूपा, सबकी पूज्य और आश्रयहीन हैं। आप सर्वज्ञ हैं, सब प्रकार से मंगलमय हैं और सब मंगलों में मंगलमय हैं। हे माँ दुर्गा, आपका स्वरूप इतना विशाल है कि उसे शब्दों में वर्णित करना संभव नहीं है। फिर भी भक्त आपको दुनिया के हर कोने में पाते हैं। माँ दुर्गा की स्तुति करने के लिए पढ़ें - संस्कृत श्लोक यानी दुर्गा स्तुति मंत्र।

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यैः नमस्तस्यैः नमस्तस्यैः नमो नमः।
ओम अम्बायै नमः।

अर्थ: जो देवी सभी जीवों की माता के रूप में विद्यमान हैं, जो देवी हर जगह शक्ति के रूप में स्थापित हैं, जो देवी हर जगह शांति की प्रतीक हैं, ऐसी देवी को बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। जय भगवती देवी नमो वरदे जय पापविनाशिनी बहुफलादे।

जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवी नरार्तिहरे॥1॥
जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे।
जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥
जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे।
जय देवी पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥
जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते।
जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥
जय देवी समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे।
जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥
एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥