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जानिए आखिर एकलव्य ने अपना अंगूठा काटने का बदला गुरू द्रोणाचार्य से कैसे लिया था

 

जयपुर। हम आपको इस लेख में एकलव्य के बारे में कुछ विशेष जानकारी दे रहें हैं, आखिर किस प्रकार एकलव्य ने अपने अंगूठे काटने का बदला गुरु द्रोणाचार्य से लिया था। एकलव्य को धनुष विघा का ज्ञान कर्ण और अर्जुन के समान ही था, धनुष विघा में एकलव्य को जीतना मुश्किल था। एकलव्य में धनुषविघा का ज्ञान बगैर गुरु के हासिल किया था।

एकलव्य ने धनुर्विद्या का ज्ञान स्वयं से हासिल किया, एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति बना कर उसके सामने धनुषविघा का ज्ञान हासिल किया ओर सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी की उपलब्धि हासिल कर ली थी। लेकिन जब इस बात का पता गुरु द्रोणाचार्य को लगा, तो उन्होंने गुरु दक्षिणा में एकलव्य का अंगूठा मांग लिया जो एकलव्य ने काट के दे दिया। क्योकि गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्य अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी बनाना चाहते थे।

जब एकलव्य ने अपना अंगूठा काट कर गुरु दक्षिणा दी उस समय एकलव्य को यह विचार नहीं आया, कि अंगूठे के बिना धनुष नहीं चला सकता। एकलव्य के पिता देवश्रवा थे। एकलव्य रुक्मणी स्वयंवर में अपने पिता की जान बचाते हुए मारा गया, एकलव्य ने बगैर अंगूठे के लडने का प्रयास किया जिस कारण से भगवान श्री कृष्ण उससे प्रभावित हुए और उसे वरदान दिया कि तू अगले जन्म में अपने साथ हुए धोखे का प्रतिशोध लेगा।

इसके बाद अगले जन्म में एकलव्य धृष्टधुम्न के रुप में जन्मा जिसने महाभारत के युद्ध में गुरु द्रोणाचार्य का सर काटा था, इस प्रकार एकलव्य यानि धृष्टधुम्न ने गुरु द्रोणाचार्य के द्वारा दिए गये धोखे का बदला गुरु द्रोण का सर काट कर लिया।