आस्था, चमत्कार और रहस्य का संगम है कामाख्या मंदिर, वीडियो में जानिए क्यों हर साल 3 दिन के लिए लाल हो जाता है ब्रह्मपुत्र नदी का पानी ?
असम के गुवाहाटी से दो मील पश्चिम में नीलगिरि पर्वत पर स्थित सिद्धि पीठ को कामाख्या मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसका उल्लेख कालिका पुराण में मिलता है। कामाख्या मंदिर को सबसे प्राचीन शक्ति पीठ माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार माता सती का योनि भाग कामाख्या नामक स्थान पर गिरा था। इसके बाद इस स्थान पर देवी का पवित्र मंदिर स्थापित किया गया। कामाख्या देवी मंदिर मां दुर्गा के शक्ति पीठों में से एक है। तांत्रिक इस मंदिर में अपनी सिद्धियों को सिद्ध करने के लिए आते हैं।
कैसे हुआ कामाख्या शक्ति पीठ का निर्माण
माता सती ने अपने पिता के व्यवहार से नाराज होकर अपना शरीर हवन कुंड की अग्नि को समर्पित कर दिया था। महादेव ने उनके पार्थिव शरीर को अपने कंधे पर रखकर तांडव करना शुरू कर दिया था, जिससे संसार में विनाश की स्थिति पैदा हो गई थी। तब संसार को विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को कई भागों में काट दिया, जहां-जहां ये टुकड़े गिरे, वे स्थान शक्ति पीठ कहलाए। कामाख्या स्थान पर माता सती का योनि भाग गिरा था। इसीलिए इसे कामाख्या देवी के नाम से जाना जाता है। माता सती के कुल 52 शक्तिपीठ हैं, लेकिन एक शक्तिपीठ पाकिस्तान में स्थित है। भारत में कुल 51 शक्तिपीठ हैं।
कुंड की होती है पूजा
51 शक्तिपीठों में से सिर्फ कामाख्या मंदिर को ही महापीठ का दर्जा प्राप्त है, लेकिन इस मंदिर में मां दुर्गा और मां जगदंबा की कोई तस्वीर या मूर्ति नहीं है। भक्त मंदिर में बने कुंड पर फूल चढ़ाकर पूजा करते हैं। इस कुंड को फूलों से ढका रखा जाता है, क्योंकि कुंड देवी सती की योनि का हिस्सा है, जिसकी पूजा भक्त करते हैं। इस कुंड से हमेशा पानी का रिसाव होता रहता है। इसलिए इसे फूलों से ढका रखा जाता है।
नदी का पानी लाल हो जाता है
मान्यता के अनुसार, ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिनों तक लाल हो जाता है। इसका कारण कामाख्या देवी मां का मासिक धर्म बताया जाता है। ऐसा हर साल अंबुबाची मेले के दौरान होता है। इन तीन दिनों में इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। भक्तों को प्रसाद के रूप में लाल रंग का सूती कपड़ा भेंट किया जाता है।