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Hanuman Jayanti 2025: दुनिया का इकलौता मंदिर जहाँ पूजे  जाते है दाढ़ी-मूंछ वाले हनुमान जी, 2 मिनट के शानदार वीडियो में करे चमत्कारी दर्शन 

 

देश में 12 अप्रैल 2025 को हनुमान जयंती मनाई जा रही है। जैसे-जैसे हनुमान जयंती का पर्व नजदीक आ रहा है, राजस्थान का सालासर बालाजी धाम भक्ति और आस्था के रंगों में डूबता जा रहा है। सालासर बालाजी धाम देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान हनुमान दाढ़ी-मूंछ के साथ विराजमान हैं।वनइंडिया हिंदी से बातचीत में सालासर बालाजी मंदिर पुजारी परिवार के अजय पुजारी ने बताया कि हनुमान जयंती 2025 पर सालासर बालाजी के पट शनिवार सुबह 2 बजे से खुलेंगे, जो रात 9 बजे बंद होंगे।

<a href=https://youtube.com/embed/yQ8AEqUOB4Y?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/yQ8AEqUOB4Y/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden"" title="अयोध्या हनुमान गढ़ी, सालासर बालाजी, मेहंदीपुर बालाजी, जाखू और कष्टभंजन हनुमान | Salasar, Mehndipur" width="1250">

इस दौरान हनुमान जयंती पर करीब डेढ़ लाख श्रद्धालुओं के सालासर धाम पहुंचने की उम्मीद है। आम दिनों में सालासर बालाजी मंदिर सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है।अजय पुजारी का कहना है कि सालासर बालाजी में हनुमान सेवा समिति की ओर से सभी व्यवस्थाएं दुरुस्त कर दी गई हैं। श्रद्धालु 8 लाइनों से गुजरकर बाबा के दर्शन को पहुंच सकेंगे। दिव्यांगों के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है। अलग कतार के अलावा उनके लिए वाहन सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है।

सालासर बालाजी की चमत्कारी मूर्ति और ऐतिहासिक कथा
राजस्थान के चूरू जिले के सुजानगढ़ कस्बे के पास सालासर गांव में स्थित यह हनुमान मंदिर सिर्फ भक्ति का स्थान ही नहीं है, बल्कि एक गहरी किंवदंती और चमत्कारी इतिहास भी समेटे हुए है। 1811 में राजस्थान के नागौर जिले के असोटा गांव में एक जाट किसान को खेत जोतते समय जमीन में एक पत्थर मिला, जिसे साफ करने पर उसमें बालाजी की छवि दिखाई दी। उसी रात बालाजी ने असोटा के ठाकुर और अपने परम भक्त मोहनदास महाराज को स्वप्न में मूर्ति को सालासर ले जाकर स्थापित करने का आदेश दिया और जहां बैलगाड़ी अपने आप रुकी, वहां मूर्ति स्थापित हो गई। सालासर बालाजी मंदिर के बारे में यह भी मान्यता है कि बालाजी ने मोहनदास को दाढ़ी-मूंछ वाले रूप में दर्शन दिए थे और इसीलिए आज भी यहां इस रूप की पूजा की जाती है।