गणेश उत्सव के 10 दिनों तक रोज करें ये चमत्कारी पाठ हर संकट होगा दूर और जीवन में आएगा सुख-समृद्धि, वीडियो में जाने विधि
भगवान गणपति के बिना कोई भी शुभ कार्य आरंभ नहीं होता क्योंकि हिंदू धर्म में उन्हें प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। पंचदेवों में गणपति का विशेष स्थान है और उन्हें सृष्टि का प्रथम देवता माना जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित शशि शेखर त्रिपाठी के अनुसार अगर जीवन में दुख के बादल छंट नहीं रहे हैं, कर्ज बढ़ना, कार्यों में रुकावट, घर के आंगन में हंसी की आवाज न आना, शुभ कार्यों में रुकावट आदि समस्याओं से परेशान हैं तो समाधान के लिए नियमित रूप से गणपति जी का ध्यान करना चाहिए। वे विघ्नहर्ता हैं और उनकी पूजा से सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं।
अगर आप भी गणपति जी को प्रसन्न कर समस्याओं से मुक्ति पाना चाहते हैं तो भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी यानी 7 सितंबर से नियमित रूप से गणेश जी का ध्यान करें, उनकी पूजा करें और उनके संकष्टनाशन स्तोत्र का पाठ करें। संकष्टनाशन स्तोत्र बहुत शक्तिशाली होता है। भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए संकष्टनाशन स्तोत्र का पाठ करना बहुत प्रभावशाली माना जाता है। इस स्तोत्र के माध्यम से हम भगवान गणेश के बारह पवित्र नामों का जाप करते हैं, जो भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि और सभी प्रकार की सिद्धियों (पूर्णताओं) को प्राप्त करने में मदद करते हैं। इस गणेश उत्सव पर इन नामों की पूरी श्रद्धा के साथ पूजा करें।
संकष्टनाशन स्तोत्र का महत्व
यह स्तोत्र भगवान गणेश की कृपा पाने का एक अद्भुत और सटीक साधन है। संकष्टनाशन स्तोत्र का वर्णन नारद पुराण में किया गया है और इसे स्वयं नारद ने कहा है। यह उन भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो अपने जीवन में समस्याओं का समाधान चाहते हैं। यह स्तोत्र भगवान गणेश के बारह रूपों की स्तुति करता है। नियमित रूप से गणेश का ध्यान करने और स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति दीर्घायु और मनोकामनाओं की पूर्ति प्राप्त करता है। नियमित रूप से गणेश का ध्यान करने से जीवन के सभी कार्य सफल होते हैं और उनकी कृपा से आयु और समृद्धि बढ़ती है।
संकष्टनाशन मंत्र
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायु:कामार्थसिद्धये ।।१ ।।
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।।
तृतीयं कृष्णपिङ्गगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ।।२।।
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ।।३ ।।
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ।।४ ।।
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं य: पठेन्नर: ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ।।५ ।।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ।।६ ।।
जपेत् गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासै: फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय: ।।७ ।।
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत: ।।८ ।।
इति श्री नारदपुराणे संकटविनाशनं श्रीगणपतिस्तोत्रं संपूर्णम् ।
गणेश द्वादश नाम स्तोत्र
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥