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क्या बदला 6 साल के स्पेस सफर से? नासा के 1.25 करोड़ टमाटर के बीजों पर हुए अनोखे रिसर्च से सामने आया बड़ा सच

 

अंतरिक्ष में जाने के बाद क्या किसी पौधे के बीजों में कोई स्थायी बदलाव आ सकता है? क्या अंतरिक्ष के वातावरण में लंबे समय तक रहने से बीजों के अंकुरण और पौधों की ग्रोथ पर असर पड़ता है? इन सवालों का जवाब जानने के लिए NASA ने कई दशक पहले एक अनोखा प्रयोग किया था।इस प्रयोग में करीब 1.25 करोड़ टमाटर के बीज अंतरिक्ष में भेजे गए। ये बीज करीब छह साल तक अंतरिक्ष में रहने के बाद 1990 में वापस पृथ्वी पर लाए गए। इसके बाद इन्हें छात्रों के बीच प्लांटिंग किट के रूप में बांटा गया, ताकि बच्चे खुद इन बीजों को उगाकर अंतरिक्ष में रहने और पृथ्वी पर रखे गए बीजों के बीच अंतर देख सकें।इस पूरे प्रयोग में करीब 40 हजार स्कूलों और लाखों छात्रों की भागीदारी हुई। इसका उद्देश्य केवल वैज्ञानिक रिसर्च करना नहीं था, बल्कि बच्चों को अंतरिक्ष विज्ञान और प्रयोग की प्रक्रिया से सीधे जोड़ना भी था।

NASA के प्रयोग का नाम था SEEDS

NASA के इस प्रोजेक्ट का नाम SEEDS यानी Space Exposed Experiment Developed for Students था। इस प्रोग्राम में NASA के मुख्यालय, लैंगली रिसर्च सेंटर और अमेरिकी बीज कंपनी George W. Park Seed Company की भागीदारी थी।

प्रयोग के लिए सभी बीज एक ही किस्म के चुने गए थे। इन्हें Rutgers California Supreme टमाटर किस्म से लिया गया था।

एक ही किस्म के बीज इस्तेमाल करने का मकसद यह था कि पौधों में होने वाले संभावित अंतर को आनुवंशिक विविधता से जोड़ने की संभावना कम हो और अंतरिक्ष में रहने के प्रभाव का बेहतर अध्ययन किया जा सके।

बीजों को अंतरिक्ष में कैसे रखा गया?

इन बीजों को Long Duration Exposure Facility यानी LDEF के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया था। यह एक बड़ा वैज्ञानिक प्लेटफॉर्म था, जिसे लंबे समय तक अंतरिक्ष के वातावरण में विभिन्न सामग्रियों को रखने और उनके प्रभावों का अध्ययन करने के लिए तैयार किया गया था।

बीजों को लगभग छह साल तक अंतरिक्ष के वातावरण के संपर्क में रखा गया। इसके बाद उन्हें वापस पृथ्वी पर लाया गया और वैज्ञानिक प्रयोग के अगले चरण की शुरुआत हुई।

छात्रों को क्यों दिए गए बीज?

NASA ने इस प्रयोग को सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा। इसका सबसे खास हिस्सा था इसमें छात्रों की भागीदारी।

बीजों के दो समूह तैयार किए गए थे। पहला समूह वह था जो लगभग छह साल अंतरिक्ष में रहा था, जबकि दूसरा समूह पृथ्वी पर नियंत्रित परिस्थितियों में रखा गया था। इस दूसरे समूह को कंट्रोल ग्रुप कहा गया।

इसके बाद दोनों तरह के बीजों को स्कूलों में भेजा गया, ताकि छात्र उन्हें एक जैसे तरीकों से उगाकर तुलना कर सकें।

NASA की शैक्षिक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 1,32,000 प्लांटिंग किट शिक्षकों तक पहुंचाई गईं। इस कार्यक्रम में अमेरिका के सभी 50 राज्यों और कई दूसरे देशों के स्कूल शामिल हुए।

बच्चों ने पौधों में क्या-क्या देखा?

छात्रों को सिर्फ बीज बोने के लिए नहीं कहा गया था। उन्हें पौधों की ग्रोथ पर लगातार नजर रखने और उसका रिकॉर्ड तैयार करने के लिए कहा गया।

छात्रों ने यह नोट किया कि—

  • कितने बीज अंकुरित हुए
  • पहला अंकुर निकलने में कितना समय लगा
  • पौधे की शुरुआती ग्रोथ कैसी रही
  • पत्तियों और तनों में क्या बदलाव आया
  • फूल कब आए
  • फल बनने में कितना समय लगा
  • पौधों की अंतिम स्थिति कैसी रही

इसके बाद छात्रों की रिपोर्ट NASA तक पहुंचाई गईं। बताया जाता है कि प्रोजेक्ट के दौरान एजेंसी को करीब 8,000 रिपोर्ट प्राप्त हुईं।

क्या अंतरिक्ष वाले बीज तेजी से उगे?

प्रयोग के आंकड़े काफी दिलचस्प थे।

रिपोर्ट के मुताबिक अंतरिक्ष में रखे गए बीजों की अंकुरण दर करीब 73.8% रही, जबकि पृथ्वी पर रखे गए कंट्रोल बीजों की अंकुरण दर लगभग 70.3% थी।

अंतरिक्ष वाले बीजों में औसतन करीब 8 दिन में अंकुरण देखा गया, जबकि कंट्रोल ग्रुप के बीजों को करीब 8.3 दिन लगे।

यानी शुरुआत में अंतरिक्ष में रखे गए बीजों में हल्का फायदा दिखाई दिया। शुरुआती कुछ हफ्तों में उनकी बढ़त भी कुछ तेज देखी गई।

लेकिन कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसके बाद सामने आया।

आखिर में कोई बड़ा स्थायी अंतर नहीं मिला

प्रयोग के शुरुआती चरण में अंतरिक्ष वाले बीजों में कुछ छोटे अंतर जरूर दिखाई दिए, लेकिन समय बीतने के साथ ये अंतर कायम नहीं रहे।

प्रोजेक्ट की समरी के मुताबिक पौधों की अंतिम ग्रोथ और फलों में ऐसा कोई बड़ा या स्थायी अंतर नहीं पाया गया, जिसे अंतरिक्ष में करीब छह साल रहने का स्पष्ट प्रभाव माना जा सके।

यानी लंबे समय तक अंतरिक्ष के वातावरण के संपर्क में रहने के बावजूद इन टमाटर के बीजों में ऐसा स्थायी बदलाव नहीं दिखा, जिसने उनके सामान्य पौधे बनने की प्रक्रिया को बड़े स्तर पर बदल दिया हो।

विज्ञान के साथ बच्चों की सीख भी बनी खास

SEEDS प्रोजेक्ट की सबसे खास बात सिर्फ इसका वैज्ञानिक परिणाम नहीं था। यह इस बात का उदाहरण भी बना कि बड़े वैज्ञानिक प्रयोगों में छात्रों को किस तरह शामिल किया जा सकता है।

लाखों छात्रों को ऐसे बीज मिले जो वास्तव में अंतरिक्ष में रह चुके थे। उन्होंने खुद उन्हें मिट्टी में लगाया, पौधों की ग्रोथ देखी, आंकड़े लिखे और फिर अपने निष्कर्ष वैज्ञानिकों तक पहुंचाए।

इस तरह एक अंतरिक्ष प्रयोग सीधे क्लासरूम तक पहुंच गया।

छह साल अंतरिक्ष में रहने के बाद भी टमाटर सामान्य रहे

इस प्रयोग से सामने आया मुख्य निष्कर्ष यह था कि करीब छह साल तक अंतरिक्ष के वातावरण में रखे गए टमाटर के बीजों में शुरुआती स्तर पर कुछ मामूली अंतर दिखाई दिए, लेकिन पौधों के पूरे जीवन चक्र में कोई बड़ा स्थायी अंतर नहीं मिला।

SEEDS इसलिए भी यादगार रहा क्योंकि इसने अंतरिक्ष विज्ञान को केवल वैज्ञानिकों और प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रखा। हजारों स्कूलों और लाखों छात्रों ने इसमें हिस्सा लेकर खुद देखा कि अंतरिक्ष में भेजी गई चीजों को वापस पृथ्वी पर लाकर किस तरह वैज्ञानिक प्रयोग किया जा सकता है।