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अरब देशों पर मंडराया सूखा और भुखमरी का खतरा! UN की रिपोर्ट ने बढ़ाई मिडिल ईस्ट की धड़कनें

 

जलवायु परिवर्तन का असर अब अरब दुनिया में तेजी से दिखाई देने लगा है। पानी की कमी, खेती के घटते उत्पादन और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों ने इस क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पहले से ही गंभीर जल संकट से जूझ रहे अरब देशों में अब जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्य असुरक्षा और मानवीय संकट का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों ने आने वाले समय को लेकर चिंता जताई है।

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों के लिए संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के कोऑर्डिनेटर अहमद मुख्तार के मुताबिक, प्रति व्यक्ति ताजे पानी की उपलब्धता के लिहाज से अरब क्षेत्र दुनिया के सबसे अधिक जल-संकट वाले इलाकों में शामिल है। यहां खेती योग्य जमीन कुल क्षेत्रफल के 5 प्रतिशत से भी कम है, जबकि रेगिस्तानी इलाकों का विस्तार लगातार बढ़ रहा है।

पानी की कमी बनी सबसे बड़ी चुनौती

अरब देशों में उपलब्ध ताजे पानी का बड़ा हिस्सा खेती के काम आता है। ऐसे में पानी की कमी का सीधा असर किसानों और कृषि उत्पादन पर पड़ता है। उत्पादन घटने के साथ इन देशों की खाद्य जरूरतों के लिए वैश्विक आयात पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।

अहमद मुख्तार का कहना है कि जलवायु परिवर्तन पहले से मौजूद समस्याओं को और गंभीर बना रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस क्षेत्र के कई देश औद्योगीकरण के दौर से गुजर रहे हैं, जिससे आने वाले समय में उनका कार्बन फुटप्रिंट और बढ़ सकता है।

खाने के लिए बढ़ेगी दूसरे देशों पर निर्भरता

अरब क्षेत्र पहले से ही खाद्य पदार्थों के आयात पर काफी निर्भर है। FAO के अनुमान के मुताबिक, 2031 तक इस क्षेत्र में कुल खाद्य खपत का करीब दो-तिहाई हिस्सा आयात से पूरा किया जा सकता है। कुछ खाड़ी देश अपनी खाद्य जरूरतों का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा दूसरे देशों से मंगाते हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि पानी की भारी कमी के बावजूद अरब देश खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में कैसे आगे बढ़ेंगे। विशेषज्ञों के मुताबिक, पूरी तरह आत्मनिर्भर होना व्यावहारिक विकल्प नहीं है। इसलिए आर्थिक रूप से टिकाऊ व्यवस्था और सुरक्षित आयात प्रणाली तैयार करना जरूरी होगा।

फसलों की पैदावार पर भी असर

संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम की क्षेत्रीय निदेशक समर अब्देलजाबेर के अनुसार, जलवायु से जुड़े झटकों का असर फसल उत्पादन, लोगों की आजीविका और खाद्य कीमतों पर पड़ रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर कमजोर परिवारों पर पड़ता है, जिनके लिए पौष्टिक भोजन जुटाना मुश्किल हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण पानी की उपलब्धता और मौसम में अस्थिरता बढ़ने से फल, सब्जियों और पशुपालन जैसे क्षेत्रों पर भी दबाव बढ़ सकता है। जिन इलाकों में पहले से संघर्ष या मानवीय संकट मौजूद हैं, वहां इसका असर और गंभीर होने की आशंका है।

सूखे से बढ़ सकती हैं किसानों की मुश्किलें

यूनिसेफ के पानी, स्वच्छता और साफ-सफाई (WASH) मामलों के वरिष्ठ सलाहकार उमर अल-हत्ताब ने समय रहते तैयारी करने की जरूरत पर जोर दिया है। उनका कहना है कि जरूरी सामान पहले से उपलब्ध कराना, शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना और स्थानीय स्तर पर आपदा से निपटने की क्षमता बढ़ाना जरूरी है।

लंबे समय तक सूखा पड़ने से कृषि उत्पादन घट सकता है, मवेशियों पर असर पड़ सकता है और ग्रामीण आबादी की आजीविका खतरे में आ सकती है।

समाधान भी मौजूद, जरूरत सही तैयारी की

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए कई व्यावहारिक उपाय मौजूद हैं। खराब हो चुकी जमीन को दोबारा उपयोगी बनाया जा सकता है, पानी के बेहतर प्रबंधन को अपनाया जा सकता है और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल किया जा सकता है।

इसके अलावा जलवायु के अनुकूल खेती, पानी की बचत करने वाली तकनीक और बेहतर आपदा प्रबंधन व्यवस्था भी इस संकट से निपटने में मदद कर सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, चुनौती सिर्फ संकट आने के बाद उससे निपटने की नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है जो संकट को बड़ी आपदा बनने से पहले ही रोक सके। अरब देशों के लिए आने वाले वर्षों में पानी और खाद्य सुरक्षा इसी तैयारी की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।