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समुद्री विज्ञान में अनोखा योगदान: ऑटो ड्राइवर और 'एलेक्स अंकल' के ज़रिए सामने आई सीहॉर्स की ख़ास प्रजाति

 

आमतौर पर ऑटो रिक्शा चलाने वाले व्यक्ति और समुद्र में किसी नई प्रजाति की खोज के बीच कोई सीधा संबंध नजर नहीं आता। लेकिन तमिलनाडु में एक ऑटो ड्राइवर की छोटी-सी मदद ने वैज्ञानिकों को हिंद महासागर में सीहॉर्स की एक नई प्रजाति खोजने में अहम भूमिका निभाई।

सीहॉर्स एक छोटी समुद्री मछली है, जिसका सिर घोड़े जैसा दिखाई देता है और पूंछ मुड़ी हुई होती है। इस नई खोज का श्रेय वैज्ञानिक शालू कन्नन की रिसर्च को जाता है, लेकिन इस पूरी कहानी में स्थानीय मछुआरों और एक ऑटो ड्राइवर की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही।

तीन हफ्ते की रिसर्च के बाद भी नहीं मिला नमूना

साल 2019 की गर्मियों में शालू कन्नन अपनी पीएचडी थीसिस के लिए तमिलनाडु के तटीय शहर तूतीकोरिन, जिसे अब थूथुकुडी कहा जाता है, में फील्ड स्टडी कर रही थीं।

करीब तीन हफ्तों की मेहनत के बाद भी उन्हें उस खास सीहॉर्स प्रजाति का नमूना नहीं मिल पाया था, जिसकी वह तलाश कर रही थीं।

शालू के मुताबिक, वह अपने एक सहकर्मी के साथ ऑटो रिक्शा में सफर कर रही थीं और दोनों सीहॉर्स के बारे में बात कर रहे थे। ऑटो ड्राइवर ने उनकी बातचीत सुन ली और पूछा कि आखिर उन्हें किस चीज की तलाश है।

जब शालू ने उन्हें बताया कि वह एक खास प्रजाति का सीहॉर्स खोज रही हैं लेकिन अभी तक सफल नहीं हुई हैं, तो ड्राइवर ने कहा कि वह एक मछुआरे को जानते हैं और उनसे बात कर सकते हैं।

अगले ही दिन मिला पहला नमूना

ऑटो ड्राइवर की मदद से शालू की मुलाकात एक स्थानीय मछुआरे से हुई। इसके अगले ही दिन, 27 अप्रैल 2019 को तूतीकोरिन मछली बंदरगाह पर उन्हें बायकैच के ढेर में सीहॉर्स का पहला नमूना मिल गया।

बायकैच उन समुद्री जीवों को कहा जाता है, जो मछली पकड़ने वाले जाल में अनजाने में फंस जाते हैं।

जांच में पता चला कि यह नमूना आनुवंशिक रूप से हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स से अलग था। लेकिन नई प्रजाति की पुष्टि के लिए शालू को एक और नमूने की जरूरत थी।

इसके बाद स्थानीय मछुआरों की मदद से करीब पांच महीने बाद 2 सितंबर 2019 को दूसरा नमूना भी मिल गया।

रिसर्च के बाद सामने आई नई प्रजाति

काफी रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बाद वैज्ञानिकों ने पुष्टि की कि यह सीहॉर्स की एक अलग प्रजाति है। केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज एंड ओशन स्टडीज (KUFOS) की टीम के नेतृत्व में हुए अध्ययन में इस नई प्रजाति का नाम हिप्पोकैम्पस अमांडाविन्सेटाए रखा गया।

इसका नाम सीहॉर्स की विशेषज्ञ और प्रोजेक्ट सीहॉर्स की संस्थापक अमांडा विंसेंट के सम्मान में रखा गया है।

रिसर्च के मुताबिक, कांटेदार सीहॉर्स को पहले एक ही प्रजाति माना जाता था, लेकिन अध्ययन से पता चला कि इनमें तीन अलग-अलग प्रजातियां हैं।

वैज्ञानिकों ने सीहॉर्स के बाहरी शारीरिक गुणों के साथ-साथ आनुवंशिक और फाइलोजेनेटिक विश्लेषण भी किया। इसके बाद यह स्पष्ट हुआ कि मिला हुआ नमूना पहले से पहचानी गई प्रजातियों से अलग है।

इस खोज ने सीहॉर्स के वर्गीकरण को लेकर लंबे समय से चली आ रही उलझन को भी दूर करने में मदद की।

नई प्रजाति दूसरी सीहॉर्स से कैसे अलग है?

हिप्पोकैम्पस अमांडाविन्सेटाए की पहचान उसकी शारीरिक बनावट और आनुवंशिक संरचना के आधार पर की गई है।

इसकी थूथन की लंबाई दूसरी कांटेदार सीहॉर्स प्रजातियों से अलग है। इसके सिर के ऊपरी हिस्से पर मौजूद कांटों की संख्या और उनका आकार भी अलग है। इसके अलावा धड़ और पूंछ की रिज संरचनाओं में भी अंतर पाया गया है।

इस प्रजाति का वितरण भी अलग है। जहां हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स प्रशांत महासागर और दक्षिण चीन सागर के इलाकों में पाया जाता है, वहीं नई प्रजाति हिंद महासागर में मिली है।

इसके नमूने बंगाल की खाड़ी और लक्षद्वीप सागर के अलावा मेडागास्कर, मोजाम्बिक और सेशेल्स से भी मिले हैं।

सीहॉर्स समुद्री पर्यावरण के लिए क्यों अहम हैं?

सीहॉर्स को समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। ये पानी की गुणवत्ता और अपने आसपास के आवास में होने वाले बदलावों के प्रति संवेदनशील होते हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, जहां समुद्री आवास पर ज्यादा दबाव होता है या गाद जमा होती है, वहां सीहॉर्स की मौजूदगी कम हो जाती है। इसलिए इनका पाया जाना स्वस्थ तटीय पर्यावरण का संकेत माना जा सकता है।

भारत के समुद्री क्षेत्र में सीहॉर्स की कई प्रजातियां पाई जाती हैं और नई प्रजाति की पहचान से इनके संरक्षण की जरूरत और महत्वपूर्ण हो गई है।

मछली पकड़ने के जाल से सबसे बड़ा खतरा

सीहॉर्स को सबसे बड़े खतरों में से एक मछली पकड़ने के दौरान बायकैच के रूप में जाल में फंसना है।

विशेषज्ञों के मुताबिक हिंद महासागर में मछली पकड़ने का दबाव काफी ज्यादा है। छोटे पारंपरिक मछुआरों से लेकर बड़े कारोबारी और औद्योगिक स्तर पर मछली पकड़ने वाले समूह समुद्र में सक्रिय हैं।

बॉटम ट्रॉलिंग के दौरान समुद्र की सतह के नीचे भारी जाल घसीटे जाते हैं, जिससे सीहॉर्स समेत कई समुद्री जीव अनजाने में जाल में फंस जाते हैं।

सीहॉर्स के अवैध व्यापार की समस्या भी बनी हुई है। इन्हें सुखाकर या पाउडर के रूप में गैर-कानूनी तरीके से दूसरे देशों में भेजे जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं।

इस खोज में मछुआरों की भूमिका बेहद अहम रही

शालू कन्नन के लिए इस रिसर्च में स्थानीय मछुआरों की मदद सबसे महत्वपूर्ण रही। वह 2018 से एक मछुआरे को जानती थीं, जिन्हें वह प्यार से 'एलेक्स अंकल' कहती हैं।

मछली पकड़ने वाली नावें अक्सर रात में लौटती थीं। शालू के लिए इतनी रात में बंदरगाह पर जाना मुश्किल था, इसलिए एलेक्स अंकल खुद जाकर सीहॉर्स के नमूने इकट्ठा करते और उन्हें इसकी जानकारी देते थे।

शालू के मुताबिक, मछुआरों की मदद के बिना इस खोज को पूरा करना संभव नहीं था।

शालू अब भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के फिशरीज साइंस डिवीजन में प्रोजेक्ट साइंटिस्ट हैं और उनकी पोस्टिंग पोर्ट ब्लेयर, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में है।

इस पूरी कहानी की खास बात यह है कि एक वैज्ञानिक की वर्षों की मेहनत में एक ऑटो ड्राइवर की अनजाने में सुनी गई बातचीत और स्थानीय मछुआरों की मदद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह खोज बताती है कि वैज्ञानिक अनुसंधान में स्थानीय लोगों का अनुभव और सहयोग कितना अहम हो सकता है।