'न पाक के आतंकी छिपेंगे, न चीन की चाल चलेगी...' ISRO आज अन्तरिक्ष में तैनात करने जा रहा दिव्य दृष्टि, जाने मिशन की पूरी जानकारी
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) 2026 की अपनी पहली लॉन्चिंग के साथ इतिहास रचने जा रहा है। PSLV-C62 रॉकेट आज, 12 जनवरी को सुबह 10:17 बजे IST पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC), श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया जाएगा। इस मिशन का मुख्य पेलोड DRDO द्वारा विकसित EOS-N1 (अन्वेषा) सैटेलाइट है, जिसे 'दिव्य दृष्टि' या हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट के नाम से भी जाना जाता है। यह सैटेलाइट न केवल पर्यावरण निगरानी में क्रांति लाएगा, बल्कि रक्षा क्षेत्र में भारत की क्षमताओं को भी मजबूत करेगा। यह पाकिस्तान से आतंकवादियों के छिपने की कोशिशों और सीमा पर चीन की चालों का पर्दाफाश करने में मदद करेगा।
एक बीमार क्रू सदस्य के कारण चार अंतरिक्ष यात्री वापस लौटेंगे, जो अंतरिक्ष स्टेशन के इतिहास में पहली बार हुआ है। EOS-N1 के अलावा, इस मिशन में 14 अन्य सह-यात्री सैटेलाइट भी शामिल हैं, जिनमें घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों के सैटेलाइट भी शामिल हैं। इन्हें न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के माध्यम से लॉन्च किया जा रहा है। आइए इस मिशन के विवरण और लाभों के बारे में और जानें।
यह मिशन क्या है?
PSLV-C62 PSLV रॉकेट का 64वां लॉन्च और PSLV-DL वेरिएंट की 5वीं उड़ान है। यह मिशन सैटेलाइट को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट (SSO) में स्थापित करेगा, जहाँ EOS-N1 और अन्य 14 सैटेलाइट रखे जाएँगे। एक KID कैप्सूल को भी री-एंट्री ट्रेजेक्टरी में भेजा जाएगा। लॉन्च का लाइव स्ट्रीम ISRO के YouTube चैनल पर सुबह 9:48 बजे शुरू होगा। ISRO के चेयरमैन वी. नारायणन ने लॉन्च से पहले तिरुपति मंदिर में पूजा-अर्चना की, जो उनकी परंपरा का हिस्सा है। यह मिशन ISRO के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पिछले साल मई में PSLV की विफलता के बाद एक वापसी मिशन है। काउंटडाउन 11 जनवरी को दोपहर 12:18 बजे शुरू हुआ, जो 22.5 घंटे तक चला। PSLV रॉकेट की विशेषताएं और स्पेसिफिकेशन्स
पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) ISRO का सबसे भरोसेमंद रॉकेट है, जो कई सैटेलाइट को विभिन्न कक्षाओं में लॉन्च करने में सक्षम है। यह एक चार-स्टेज वाला रॉकेट है जो ठोस और तरल ईंधन के संयोजन का उपयोग करता है। PSLV-C62 एक PSLV-DL वेरिएंट है, जिसमें दो स्ट्रैप-ऑन बूस्टर हैं।
ऊंचाई: 44.4 मीटर
व्यास: 2.8 मीटर
लिफ्ट-ऑफ मास: 260 टन (इस वेरिएंट के लिए; स्टैंडर्ड PSLV 320 टन है)
स्टेज: 4 (पहला स्टेज: S139 सॉलिड रॉकेट मोटर + 2 स्ट्रैप-ऑन बूस्टर; दूसरा स्टेज: लिक्विड-फ्यूल वाला PS2; तीसरा स्टेज: सॉलिड-फ्यूल वाला; चौथा स्टेज: लिक्विड-फ्यूल वाला PS4)
थ्रस्ट: लिफ्ट-ऑफ थ्रस्ट 5867 kN
पेलोड क्षमता: SSO में 1750 kg तक; मल्टीपल ऑर्बिट की क्षमता
विशेषताएं: कई सैटेलाइट लॉन्च करने की क्षमता, उच्च विश्वसनीयता (95% सफलता दर), कम लागत (प्रति kg लॉन्च लागत लगभग $5000-7000), स्ट्रैप-ऑन बूस्टर वाले वेरिएंट (CA, DL, QL, XL)।
रॉकेट के फायदे
PSLV ने ग्लोबल स्पेस मार्केट में भारत की स्थिति को मजबूत किया है। यह कमर्शियल लॉन्च के लिए आदर्श है, जैसे कि इस मिशन में 15 सैटेलाइट।
पर्यावरण के अनुकूल: लिक्विड फ्यूल स्टेज साफ जलने को सुनिश्चित करते हैं।
रक्षा और नागरिक दोनों मिशनों के लिए उपयोगी, जैसे रिमोट सेंसिंग और नेविगेशन।
ISRO की आत्मनिर्भरता का प्रतीक: 1993 से 60 से अधिक सफल लॉन्च। मुख्य सैटेलाइट: EOS-N1 (अन्वेषा)
EOS-N1, जिसे अन्वेषा के नाम से भी जाना जाता है, DRDO द्वारा विकसित एक हाइपरस्पेक्ट्रल पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट है। इसे 2020 में लॉन्च करने की योजना थी, लेकिन COVID-19 महामारी के कारण इसमें देरी हुई।
ISRO PSLV C62 मिशन
ऑर्बिट: 600 किलोमीटर की ऊंचाई पर सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (SSO)
इमेजिंग टेक्नोलॉजी: हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग - सैकड़ों स्पेक्ट्रल बैंड में डेटा कैप्चर करता है (मानव आंख या पारंपरिक कैमरों की क्षमताओं से परे)।
वजन: लगभग 150-200 kg (माइक्रो-सैटेलाइट श्रेणी)।
पेलोड: उन्नत हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर जो संकीर्ण स्पेक्ट्रल बैंड में डेटा कैप्चर करते हैं।
जीवनकाल: 5-7 साल
अन्य विशेषताएं: AI-सक्षम डेटा प्रोसेसिंग, उच्च-रिज़ॉल्यूशन स्पेक्ट्रल विश्लेषण। अन्वेषा के फ़ायदे
रक्षा क्षेत्र: हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग से छिपे हुए टारगेट, वाहन या वनस्पति के नीचे छिपे हथियारों जैसी चीज़ों की सटीक पहचान की जा सकती है। इससे पाकिस्तान में आतंकवादी कैंपों और चीन के साथ सीमा पर होने वाली गतिविधियों की निगरानी करना आसान हो जाता है। कुछ भी छिपा नहीं रह सकता क्योंकि यह पारंपरिक इमेजिंग की तुलना में ज़्यादा विस्तृत तस्वीर दिखाता है।
पर्यावरण निगरानी: फसलों के स्वास्थ्य, जल प्रदूषण, जंगल की आग और मिट्टी की गुणवत्ता का विश्लेषण। जलवायु परिवर्तन के अध्ययनों में उपयोगी।
क्षमता निर्माण: यह भारत की अंतरिक्ष रक्षा क्षमताओं को बढ़ावा देता है, जो DRDO-ISRO सहयोग का एक उदाहरण है।
नागरिक लाभ: कृषि, आपदा प्रबंधन और संसाधन मानचित्रण में क्रांति लाता है।
सह-यात्री उपग्रह
इस मिशन में 14 अन्य उपग्रह भी शामिल हैं, जो भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों हैं।