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मंगल पर बजेगा इंसानियत का डंका! बिना ईंट और कंक्रीट के घर बनाने की नई खोज से वैज्ञानिक भी हैरान

 

मंगल ग्रह पर इंसानी बस्ती बसाने का सपना लंबे समय से वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रहा है। वहां इंसानों को पहुंचाना जितना मुश्किल है, उससे कहीं बड़ी चुनौती उनके लिए सुरक्षित रहने की जगह तैयार करना है। पृथ्वी से सीमेंट, कंक्रीट और भारी निर्माण मशीनरी मंगल तक पहुंचाना बेहद महंगा और कठिन होगा।
लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इस समस्या का एक बेहद अनोखा समाधान खोजने की दिशा में कदम बढ़ाया है। नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने जेनेटिकली इंजीनियर किए गए यीस्ट, जिलेटिन और मंगल की मिट्टी जैसी रेत (रेगोलिथ) को मिलाकर एक ऐसा बायोलॉजिकल निर्माण मटीरियल तैयार किया है, जिससे भविष्य में मंगल जैसे कठिन वातावरण में शेल्टर बनाए जा सकते हैं।खास बात यह है कि इस सामग्री को 3D प्रिंटिंग तकनीक के जरिए आकार दिया जा सकता है और इसे तैयार करने में पारंपरिक निर्माण तकनीकों की तुलना में काफी कम ऊर्जा की जरूरत पड़ सकती है।

मंगल पर घर बनाना इतना मुश्किल क्यों है?

पृथ्वी पर किसी इमारत को बनाने के लिए हमारे पास सीमेंट, स्टील, कंक्रीट, ईंट और भारी मशीनरी जैसी तमाम सुविधाएं मौजूद हैं। लेकिन मंगल ग्रह पर इनमें से ज्यादातर चीजें पृथ्वी से ले जाना आसान नहीं होगा।इसके अलावा मंगल पर वातावरण बेहद पतला है, तापमान काफी कम रहता है और सतह पर मौजूद धूल व रेगोलिथ को निर्माण सामग्री में बदलना भी चुनौतीपूर्ण है।पारंपरिक तरीके से मंगल की मिट्टी या खनिजों को मजबूत निर्माण सामग्री में बदलने के लिए बहुत ज्यादा तापमान और ऊर्जा की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में वैज्ञानिक ऐसे विकल्प की तलाश कर रहे हैं जिसे स्थानीय संसाधनों से कम ऊर्जा में तैयार किया जा सके।

वैज्ञानिकों ने तैयार किया 'लिविंग' निर्माण मटीरियल

हांगकांग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की रिसर्च टीम ने इस समस्या के लिए एक बायोलॉजिकल समाधान पर काम किया है।रिसर्च में जेनेटिकली इंजीनियर किए गए यीस्ट, जिलेटिन और रेत जैसे दानेदार पदार्थ का इस्तेमाल किया गया। वैज्ञानिकों ने एक जैविक बाइंडर की मदद से इन छोटे-छोटे कणों को आपस में जोड़कर एक मजबूत संरचना तैयार की।इस मटीरियल को 'लिविंग' निर्माण सामग्री इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इसमें जैविक घटकों का इस्तेमाल किया गया है।

मसल प्रोटीन से मजबूत होंगे रेत के कण

इस तकनीक की एक खास बात यह है कि वैज्ञानिकों ने मसल यानी सीप जैसे समुद्री जीवों के चिपचिपे प्रोटीन से प्रेरित बाइंडिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया।इसका उद्देश्य रेत या रेगोलिथ के छोटे-छोटे कणों को मजबूती से एक-दूसरे से जोड़ना है। इससे बिना पारंपरिक सीमेंट जैसी भारी निर्माण प्रक्रिया के एक मजबूत ढांचा तैयार किया जा सकता है।

कितना मजबूत है यह नया मटीरियल?

रिसर्च में तैयार किए गए मटीरियल की कंप्रेसिव स्ट्रेंथ करीब 12 मेगापास्कल (MPa) बताई गई है। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह सामान्य मिश्रण की तुलना में काफी अधिक मजबूती दिखाता है।यानी शुरुआती प्रयोगों में इस बायो-बेस्ड निर्माण सामग्री ने इतना मजबूत ढांचा बनाने की क्षमता दिखाई है कि भविष्य में इसे शेल्टर और दूसरी संरचनाओं के लिए इस्तेमाल करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है।हालांकि, इसे मंगल पर वास्तविक इंसानी घर बनाने की तकनीक मानने से पहले अभी काफी ज्यादा परीक्षण और इंजीनियरिंग की जरूरत होगी।

मंगल जैसे माहौल में 3D प्रिंट किया गया ढांचा

वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में मंगल जैसा कृत्रिम वातावरण तैयार करके इस तकनीक की जांच की। प्रयोग में लगभग माइनस 30 डिग्री सेल्सियस तापमान और 0.01 वायुमंडलीय दबाव जैसी परिस्थितियां बनाई गईं।इसके बाद 3D प्रिंटर की मदद से इस बायो-मटीरियल से एक छोटा ढांचा तैयार किया गया।यह प्रयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य में मंगल पर भी निर्माण के लिए ऑटोमेटेड 3D प्रिंटिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे सिस्टम इंसानों के पहुंचने से पहले ही शुरुआती शेल्टर तैयार करने में मदद कर सकते हैं।भारी मशीनों और ज्यादा तापमान की जरूरत कम हो सकती है

मंगल पर निर्माण के लिए सबसे बड़ी समस्या ऊर्जा और उपकरणों की है। अगर हर ईंट या निर्माण सामग्री को पृथ्वी की तरह तैयार करने के लिए बेहद ज्यादा तापमान चाहिए, तो इसके लिए बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होगी।

नई बायोलॉजिकल तकनीक का उद्देश्य इसी समस्या को कम करना है। शोधकर्ताओं के मुताबिक इस प्रक्रिया में स्थानीय रेगोलिथ का इस्तेमाल किया जा सकता है और पृथ्वी से केवल सीमित मात्रा में जैविक कच्चा माल ले जाना पड़ेगा।

सिर्फ एक घंटे की सोलर पावर से 1 क्यूबिक मीटर सामग्री?
रिसर्च में यह भी दावा किया गया है कि इस तकनीक से करीब 1 क्यूबिक मीटर निर्माण सामग्री तैयार करने के लिए लगभग एक घंटे की सौर ऊर्जा क्षमता पर्याप्त हो सकती है।

अगर भविष्य के परीक्षणों में यह क्षमता मंगल के वास्तविक वातावरण में भी साबित होती है, तो यह अंतरिक्ष निर्माण के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है।

मंगल पर सौर ऊर्जा एक महत्वपूर्ण संसाधन हो सकती है। इसलिए कम ऊर्जा में निर्माण सामग्री तैयार करने वाली तकनीक भविष्य के मिशनों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकती है।

पुरानी सामग्री को दोबारा किया जा सकता है इस्तेमाल
इस नई तकनीक की एक और खासियत इसका रिसाइक्लिंग सिस्टम बताया गया है।

रिसर्च के अनुसार इस सामग्री को क्रश करके, गर्म करके और दोबारा आकार दिया जा सकता है। प्रयोगों में कई रीसाइक्लिंग चक्रों के बाद भी इसकी मजबूती काफी हद तक बरकरार रही।

रिसर्च में चौथे रीसाइक्लिंग चक्र के बाद भी इसकी कंप्रेसिव स्ट्रेंथ करीब 11.8 MPa बताई गई है।

अगर यह तकनीक भविष्य में बड़े स्तर पर काम करती है, तो मंगल जैसे संसाधन-सीमित वातावरण में निर्माण सामग्री को बार-बार इस्तेमाल करने का फायदा मिल सकता है।

पृथ्वी से कितना सामान ले जाना पड़ेगा?
वैज्ञानिकों के मुताबिक इस तरह के निर्माण सिस्टम का एक बड़ा फायदा यह हो सकता है कि मंगल पर उपलब्ध रेगोलिथ को मुख्य निर्माण सामग्री के तौर पर इस्तेमाल किया जाए।

ऐसी स्थिति में पृथ्वी से भारी मात्रा में सीमेंट, ईंट या अन्य निर्माण सामग्री भेजने की जरूरत कम हो सकती है। शुरुआती तौर पर केवल कुछ किलोग्राम जिलेटिन, यीस्ट या अन्य जरूरी जैविक घटक मंगल तक ले जाने पड़ सकते हैं।

भविष्य में अगर मंगल पर मौजूद संसाधनों से ही इन जैविक घटकों या उनके विकल्पों को तैयार करने की तकनीक विकसित हो जाती है, तो पृथ्वी से कच्चा माल भेजने की जरूरत और भी कम हो सकती है।

मंगल ही नहीं, अंटार्कटिका में भी हो सकता है इस्तेमाल
इस तकनीक का संभावित इस्तेमाल सिर्फ मंगल ग्रह तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों के मुताबिक बेहद ठंडे और दूरदराज इलाकों में भी ऐसी निर्माण तकनीक उपयोगी हो सकती है।उदाहरण के लिए अंटार्कटिका के रिसर्च स्टेशनों में ऐसी सामग्री का इस्तेमाल भविष्य में किया जा सकता है, जहां निर्माण सामग्री और भारी मशीनों को पहुंचाना काफी मुश्किल होता है।इसके अलावा पृथ्वी के दूसरे अत्यधिक ठंडे या दुर्गम इलाकों में भी कम ऊर्जा और स्थानीय संसाधनों से निर्माण करने वाली तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।

क्या अब मंगल पर इंसानों के घर बन जाएंगे?
अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। यह रिसर्च निश्चित रूप से भविष्य के अंतरिक्ष निर्माण के लिए एक दिलचस्प संभावना दिखाती है, लेकिन प्रयोगशाला में तैयार किया गया छोटा ढांचा और मंगल पर लंबे समय तक इंसानों को सुरक्षित रखने वाला वास्तविक घर दो अलग-अलग स्तर की चुनौतियां हैं।मंगल पर किसी इंसानी शेल्टर को रेडिएशन, बेहद कम वायुदाब, तापमान में भारी बदलाव, धूल भरी परिस्थितियों और लंबे समय तक संरचनात्मक मजबूती जैसी कई चुनौतियों का सामना करना होगा।

फिर भी यीस्ट, जिलेटिन और मंगल की स्थानीय रेत से निर्माण सामग्री बनाने का विचार यह संकेत देता है कि भविष्य में मंगल पर घर बनाने के लिए पृथ्वी से पूरी निर्माण सामग्री ले जाने के बजाय वहां उपलब्ध संसाधनों और बायोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा सकता है।यानी मंगल पर इंसानी बस्ती बसाने की राह में एक और संभावित रास्ता खुला है—स्थानीय मिट्टी से 3D प्रिंटिंग और बायोलॉजी की मदद से घर तैयार करना।