ग्लेशियर कॉलैप्स से कैसे आती है विनाशकारी बाढ़? समझिए बर्फ के पहाड़ टूटने की पूरी कहानी
नेपाल के रसुवा जिले में अचानक आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचा दी है। इस आपदा में 160 से अधिक लोगों की मौत की खबर सामने आई है, जबकि सैकड़ों लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। लापता लोगों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। घटना के बाद नेपाल में बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है और भारत भी बचाव एवं राहत कार्यों में मदद कर रहा है।
5,200 मीटर की ऊंचाई से टूटा ग्लेशियर
शुरुआती जांच और सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से संकेत मिले हैं कि इस आपदा के पीछे ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरना हो सकता है। बताया जा रहा है कि करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी में जा गिरा।ग्लेशियर के साथ बर्फ, चट्टान और भारी मात्रा में मलबा भी नीचे आया। इसके बाद नदी में अचानक पानी और मलबे का तेज बहाव पैदा हुआ, जिसने फ्लैश फ्लड का रूप ले लिया। विशेषज्ञ इस घटना को ग्लेशियर कॉलैप्स से पैदा हुआ आइस-रॉक एवलॉन्च बता रहे हैं।
क्या भूकंप से टूटा ग्लेशियर?
घटना के तुरंत बाद भूकंप को संभावित वजह माना गया था। हालांकि, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी USGS के अनुसार, जिस भूकंपीय गतिविधि को शुरुआती तौर पर भूकंप समझा गया, वह ग्लेशियर, चट्टानों और बर्फ के टूटकर नीचे गिरने से पैदा हुई सेसिमिक एनर्जी भी हो सकती है।नेपाल के भूवैज्ञानिक विशेषज्ञों ने भी कहा है कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि किसी भूकंप ने इस घटना को ट्रिगर किया था। फिलहाल उपलब्ध सैटेलाइट तस्वीरें ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने और उसके बाद हुए मलबे के तेज बहाव की ओर इशारा कर रही हैं।
क्या होता है ग्लेशियर कॉलैप्स?
ग्लेशियर पहाड़ों पर लंबे समय में जमा हुई बर्फ की विशाल परत होती है, जो धीरे-धीरे नीचे की तरफ खिसकती रहती है। तापमान बढ़ने, बर्फ तेजी से पिघलने, बारिश, चट्टानों के कमजोर होने या भूकंपीय हलचल जैसी परिस्थितियों में ग्लेशियर का कोई हिस्सा अस्थिर हो सकता है।जब इसका बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर ऊंचाई से नीचे गिरता है, तो अपने साथ चट्टान, मिट्टी और बर्फ भी बहा ले जाता है। इससे घाटी में बेहद तेज रफ्तार वाला मलबे का प्रवाह पैदा हो सकता है, जो रास्ते में आने वाली बस्तियों और ढांचों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
सैटेलाइट तस्वीरों से मिले अहम संकेत
विशेषज्ञों के मुताबिक, हादसे से पहले के कुछ घंटों में ग्लेशियर क्षेत्र में बड़े बदलाव दिखाई दिए। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी के अर्थ साइंटिस्ट डैन शुगर के अनुसार, सैटेलाइट तस्वीरों में घटना से पहले बर्फ के बड़े पैमाने पर पिघलने के संकेत मिले हैं।वहीं, सिक्किम यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग जियोलॉजी विशेषज्ञ विक्रम गुप्ता ने भी सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर ग्लेशियर के निचले हिस्से के टूटने को घटना की शुरुआती वजह बताया है। उनके मुताबिक, बर्फ के साथ बड़ी मात्रा में चट्टान और मलबा भी बहाव में शामिल हुआ।कुछ विशेषज्ञों ने निर्माण गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन को भी संभावित कारकों में शामिल किया है। हालांकि, इन कारणों की भूमिका की पुष्टि के लिए विस्तृत वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी।
GLOF और ग्लेशियर कॉलैप्स में क्या अंतर है?
नेपाल की घटना को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF थी। GLOF तब होती है जब ग्लेशियर के पास बनी झील का प्राकृतिक बांध टूट जाता है और अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बहने लगता है।हालांकि, उपलब्ध शुरुआती सैटेलाइट विश्लेषण में नेपाल की इस घटना को ग्लेशियर कॉलैप्स और उससे पैदा हुए आइस-रॉक एवलॉन्च से जोड़कर देखा जा रहा है। अंतिम निष्कर्ष के लिए जांच पूरी होने का इंतजार करना होगा।
133 भारतीय नागरिक भी लापता
रिपोर्टों के अनुसार, इस आपदा में 133 भारतीय नागरिकों समेत 750 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। नेपाल में फंसे लोगों की तलाश के लिए बचाव दल लगातार अभियान चला रहे हैं।भारत सरकार ने भी नेपाल को हरसंभव मानवीय सहायता उपलब्ध कराने का भरोसा दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री से बातचीत कर राहत और बचाव कार्यों में सहयोग का आश्वासन दिया है।
भारतीय नागरिकों के लिए हेल्पलाइन जारी
काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने नेपाल में प्रभावित भारतीय नागरिकों की सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं। भारतीय नागरिक +977 985 131 6807 और +977 970 910 7500 पर संपर्क कर सकते हैं।भारतीय दूतावास के अनुसार, वह नेपाल सरकार के संबंधित अधिकारियों के संपर्क में है और प्रभावित भारतीय नागरिकों के बचाव एवं राहत के लिए समन्वय किया जा रहा है।नेपाल पर्यटन बोर्ड ने भी सहायता के लिए 1234 टोल-फ्री इमरजेंसी नंबर, 1144 हॉटलाइन और पर्यटक पुलिस का नंबर 9851289445 जारी किया है।फिलहाल राहत और बचाव अभियान जारी है। इस आपदा के पीछे ग्लेशियर टूटने, बर्फ पिघलने, भूगर्भीय गतिविधि और संभावित जलवायु प्रभावों की भूमिका को लेकर विशेषज्ञों की जांच आगे भी जारी रहेगी।