×

Eucalyptus Reality: धरती का पानी सुखा रहा है यूकेलिप्टस! जानिए क्यों दुनिया भर में मच रहा बवाल

 

भारत में लंबे समय से पर्यावरण विशेषज्ञ यूकेलिप्टस के पेड़ों की बड़े पैमाने पर खेती को लेकर चिंता जताते रहे हैं। अब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुए वैज्ञानिक अध्ययनों ने भी इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सवाल खड़े किए हैं। अफ्रीका से लेकर दक्षिण अमेरिका तक कई देशों में दशकों पहले तेजी से बढ़ने वाले यूकेलिप्टस के पेड़ों को बढ़ावा दिया गया था। इसके बाद बड़े पैमाने पर इनके बागान तैयार हुए।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन बागानों ने कुछ क्षेत्रों में भूजल और मिट्टी की स्थिति को प्रभावित किया है। ब्राजील, अर्जेंटीना, उरुग्वे और रवांडा में हुई अलग-अलग स्टडी में यूकेलिप्टस के पानी और पोषक तत्वों के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं।

ब्राजील में यूकेलिप्टस के बागानों से भूजल पर असर

ब्राजील में यूकेलिप्टस उद्योग को तेजी से बढ़ावा देने के पीछे मुख्य उद्देश्य कम समय में पेड़ तैयार करना, उन्हें लुगदी के लिए काटना और पेपर इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराना था।

हालांकि, वैज्ञानिक अध्ययनों में इसके भूजल पर असर को लेकर चिंता जताई गई है। मिनास गैरेस के एक यूकेलिप्टस क्षेत्र में करीब 45 वर्षों के दौरान भूजल स्तर में 4.5 मीटर तक की गिरावट दर्ज की गई। इसी वजह से स्थानीय स्तर पर कुछ लोग इन क्षेत्रों को 'हरा रेगिस्तान' कहने लगे हैं।

अर्जेंटीना में आसपास से भी पानी खींच रहे पेड़

अर्जेंटीना के पम्मास घास के मैदानों में भी यूकेलिप्टस के पुराने बागानों का असर देखा गया है। मध्य अर्जेंटीना के फ्लडिंग पम्मास क्षेत्र में 40 हेक्टेयर के एक बागान पर वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया। यह बागान साल 1951 में लगाया गया था।

दो साल तक चले अध्ययन में पाया गया कि आसपास के घास के मैदानों की तुलना में यूकेलिप्टस वाले क्षेत्र में भूजल 0.5 मीटर से ज्यादा नीचे था। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इससे जमीन के नीचे पानी के प्रवाह में ढाल जैसी स्थिति बन गई, जिसके कारण आसपास के घास के मैदानों से भी पानी बागान की दिशा में बहने लगा।

उरुग्वे में 20 साल तक किया गया अध्ययन

उरुग्वे में भी यूकेलिप्टस और पाइन के बागानों के जल संसाधनों पर असर को समझने के लिए लंबे समय तक अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने साल 2000 से आसपास के दो वॉटरशेड पर नजर रखी। इनमें से एक क्षेत्र को चारागाह के रूप में ही रखा गया, जबकि दूसरे में यूकेलिप्टस और पाइन के पेड़ लगाए गए।

अध्ययन के करीब 17 साल बाद सामने आया कि घास के मैदान वाले क्षेत्र की तुलना में पेड़ों वाले वॉटरशेड में पानी की उपलब्धता 35 प्रतिशत तक कम हो गई थी।

रवांडा में मिट्टी की गुणवत्ता को लेकर चिंता

पूर्वी अफ्रीकी देश रवांडा में भी विदेशी यूकेलिप्टस प्रजातियों को लेकर अध्ययन किया गया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि ये पेड़ बड़ी मात्रा में पोषक तत्वों का इस्तेमाल करते हैं। इससे लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता और उसकी दूसरी फसलों या उपयोगों के लिए उपजाऊ क्षमता प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।

रवांडा में यूकेलिप्टस प्रमुख बागान वाली प्रजातियों में शामिल हो चुका है। एक अध्ययन के अनुसार, वन बागानों में यूकेलिप्टस की हिस्सेदारी करीब 78 प्रतिशत थी। 1970 के दशक की शुरुआत में इथियोपिया, रवांडा, युगांडा, केन्या और सूडान में यूकेलिप्टस के बागान करीब 95,684 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए थे। इनमें अकेले रवांडा में लगभग 23,000 हेक्टेयर क्षेत्र यूकेलिप्टस के बागानों के अंतर्गत था।

इन अध्ययनों से संकेत मिलता है कि यूकेलिप्टस के बड़े पैमाने पर लगाए जाने से कुछ क्षेत्रों में पानी और मिट्टी से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव सामने आ सकते हैं। हालांकि, इसका असर स्थानीय जलवायु, मिट्टी, वर्षा और पेड़ों की प्रजाति जैसी परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।