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अंतरिक्ष में शुरू हो रही नई जंग? अमेरिका के पास पहुंची नई Space Warfare तकनीक, चीन और भारत भी तैयार

 

अंतरिक्ष अब सिर्फ सैटेलाइट और स्पेस मिशन तक सीमित नहीं रह गया है। दुनिया की बड़ी सैन्य ताकतें अब अंतरिक्ष को भी भविष्य के युद्ध का अहम मोर्चा मानकर अपनी तैयारियां तेज कर रही हैं। इसी बीच अमेरिका की ओर से अंतरिक्ष में सैन्य क्षमताओं को लेकर एक बड़ा दावा सामने आया है।

अमेरिकी एयरफोर्स सेक्रेटरी ट्रॉय मींक के मुताबिक, अमेरिका के पास अब ऐसे ऑन-ऑर्बिट स्पेस कंट्रोल हथियार मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल दुश्मन की कार्रवाई से अमेरिकी जॉइंट फोर्स की सुरक्षा के लिए किया जा सकता है। वहीं स्पेस ऑपरेशन्स के चीफ जनरल डगलस शीस ने भी कहा कि अमेरिकी स्पेस फोर्स के सदस्य यानी Guardians पहले से कुछ ऐसे सिस्टम ऑपरेट कर रहे हैं।

हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने इन सिस्टम से जुड़े हार्डवेयर, उनकी सटीक कक्षा या पहली बार इन्हें कब लॉन्च किया गया, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। लेकिन इन बयानों से इतना जरूर साफ है कि अमेरिका अंतरिक्ष में अपनी सैन्य क्षमता को अगले स्तर तक ले जाने की दिशा में काम कर रहा है।

Golden Dome से बदल सकता है Space Warfare का तरीका

इस पूरी रणनीति में अमेरिका का Golden Dome प्रोजेक्ट भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसका उद्देश्य अंतरिक्ष आधारित सेंसर और इंटरसेप्टर के नेटवर्क के जरिए बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों को ट्रैक करने और उन्हें रोकने की क्षमता विकसित करना है।

इस सिस्टम में बड़ी संख्या में सैटेलाइट्स का नेटवर्क शामिल होने की योजना है, जो पृथ्वी के ऊपर से मिसाइलों की गतिविधियों पर नजर रखने में मदद कर सकता है।

अगर ऐसी तकनीक बड़े स्तर पर तैनात होती है तो मिसाइल डिफेंस की रणनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। हालांकि, इसके वास्तविक प्रदर्शन और पूरी क्षमता को लेकर कई जानकारियां अभी सार्वजनिक नहीं हैं।

अमेरिका के पास सिर्फ मिसाइल डिफेंस ही नहीं

अमेरिकी स्पेस वॉरफेयर की चर्चा सिर्फ मिसाइलों को रोकने तक सीमित नहीं है। स्पेस कंट्रोल में ऐसे सिस्टम भी शामिल हो सकते हैं, जो दुश्मन के सैटेलाइट कम्युनिकेशन और सेंसर को प्रभावित कर सकें।

इनमें जैमिंग, स्पूफिंग, लेजर आधारित सेंसर-डिसरप्शन और साइबर क्षमताएं जैसी तकनीकें शामिल हैं। इनका उद्देश्य किसी सैटेलाइट को सीधे नष्ट करना जरूरी नहीं, बल्कि उसके संचार, सेंसर या काम करने की क्षमता को प्रभावित करना भी हो सकता है।

यानी भविष्य की स्पेस वॉरफेयर में लड़ाई सिर्फ मिसाइल और रॉकेट से नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक और साइबर तकनीक के जरिए भी लड़ी जा सकती है।

चीन भी तेजी से बढ़ा रहा है अपनी ताकत

अमेरिका की तरह चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य क्षमताओं को तेजी से विकसित कर रहा है। चीन ने लंबे समय से ऐसे मिशनों पर काम किया है, जिनमें एक अंतरिक्ष यान दूसरे सैटेलाइट के करीब जाकर उसके साथ डॉक या संपर्क स्थापित कर सकता है।

2016 में चीन के Shijian-17 सैटेलाइट ने रोबोटिक आर्म से जुड़ी तकनीक का प्रदर्शन किया था। इसके बाद 2022 में Shijian-21 ने एक निष्क्रिय Beidou नेविगेशन सैटेलाइट के साथ मिलन किया और उसे दूसरी कक्षा में ले जाने की क्षमता दिखाई।

ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल भविष्य में सैटेलाइट की सर्विसिंग जैसे शांतिपूर्ण कामों के लिए भी हो सकता है, लेकिन यही क्षमता सैन्य परिस्थितियों में दूसरे अंतरिक्ष यानों को प्रभावित करने के लिए भी उपयोगी हो सकती है। इसी वजह से अमेरिका और चीन के बीच स्पेस क्षमताओं की प्रतिस्पर्धा पर लगातार नजर रखी जा रही है।

भारत भी बना रहा अपनी Space Security क्षमता

इस अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा में भारत की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है। भारत के पास मजबूत नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम, सैटेलाइट टेक्नोलॉजी और लॉन्च क्षमता पहले से मौजूद है।

भारत ने Mission Shakti के जरिए एंटी-सैटेलाइट क्षमता का प्रदर्शन भी किया था। इसके अलावा देश में स्पेस सिक्योरिटी और अंतरिक्ष में संभावित खतरों से निपटने के लिए तकनीकी क्षमताओं को विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

रिपोर्ट्स में भारत के स्तर पर सैटेलाइट को ट्रैक करने, उसके साथ संपर्क स्थापित करने और अंतरिक्ष में संभावित खतरों से निपटने वाली तकनीकों पर काम की बात सामने आती रही है। साथ ही भारत का बढ़ता निजी स्पेस सेक्टर भी भविष्य की अंतरिक्ष क्षमताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

क्या लौट रहा है 'Star Wars' का दौर?

अमेरिका की नई अंतरिक्ष रणनीति की तुलना कई बार पूर्व राष्ट्रपति रॉनल्ड रीगन की Strategic Defense Initiative यानी ‘Star Wars’ योजना से की जा रही है। उस दौर में भी अंतरिक्ष आधारित मिसाइल डिफेंस की अवधारणा ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था।हालांकि आज की तकनीक और भू-राजनीतिक परिस्थितियां उस समय से काफी अलग हैं। अमेरिका, चीन और दूसरे देशों के बीच सैटेलाइट, मिसाइल डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और स्पेस सर्विलांस को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।